
मौसमी चंद्रा, प्रसिद्ध लेखिका
कभी-कभी किसी एक व्यक्ति के लिए दिल में इतना शांत सा कोना बन जाता है कि चाहे दुनिया बदल जाए, मौसम पलट जाए, वह कोना वैसा ही बना रहता है थोड़ी हंसी,थोड़ी नमी और बहुत सारी प्रतीक्षा के साथ!
मेरी कहानी भी उसी कोने से शुरू हुई थी…
वह बीच दिसंबर की एक दोपहर थी। शहर हल्की धूप के बावजूद ठंडा पड़ा था। मैं दफ्तर के काम से लाइब्रेरी गई थी, और वहाँ वह हमेशा की तरह विदेशी लेखकों की किताबों के ढेर में डूबा बैठा था… अल्बेयर कामू, काफ्का, नीत्शे… उसके आसपास एक अदृश्य सा बौद्धिक आलोक मंडराता था।
मैंने बस इतना कहा था,
“क्या प्लेग वापस ले लूँ?”
उसने मुस्कुराकर किताब बढ़ा दी।
और उसी पल मैंने नोटिस किया ,उसके होंठों के किनारे की हल्की सी लकीर, जो केवल पढ़ते समय उभरती थी। एक आदत, जो बाद में मेरे लिए दुनिया की सबसे खूबसूरत चीज़ बन गई।
वह बहुत कम बोलता था पर जो भी बोलता, लगता जैसे सोच-समझकर, तोलकर, जिम्मेदारी से कहा हो। काम की बातें तो चलती रहती, लेकिन उसके हर उत्तर के बाद मैं फोन न रखने की जिद में एक क्षण और ठहरती। शायद वह कह दे...
“मैं तुम्हें सोचता रहता हूँ…”
पर वह नहीं कहता और मैं हर बार अपने चुप पड़ते हृदय को समझाती कि शायद अगली बार…!
एक शाम, ऑफिस से निकालते-निकालते उसने कहा-
“अगर तुम फ्री हो तो एक किताब दिखानी है।”
मैं चल दी…हम कॉफी-हाउस के कोने में बैठे।
उसने ‘प्लेग’ की एक पंक्ति अंग्रेज़ी में पढ़ी—
Am well thinking of you always.
और बोला,
“सुनने में मामूली लगता है न? लेकिन असल मायने… बहुत भारी है।”
मैंने बस उसकी आँखों में देखा। वह पंक्ति मेरे भीतर उतर गई पर उसने मुझसे यह नहीं कहा कि वह मुझे सोचता है।
उसी दिन से मेरा जीवन दो हिस्सों में बँट गया…काम और उसकी प्रतीक्षा!
जब भी फोन बजता मेरा दिल धड़क उठता, और जब भी उसका संदेश आता, मेरे भीतर एक उछाह उठता शायद आज… शायद इस बार वह कहे…
फिर भी, मेरे भीतर एक अजीब सा विश्वास था कभी – न – कभी वह पिघलेगा…कभी- न – कभी वह बोल ही देगा…
कभी- न – कभी उसके होंठों से वही शब्द फिसलेंगे जिनके लिए मैं जाने कब से इंतजार में बैठी थी।
कुछ महीने बीत गए हमारी बातें कम और औपचारिक होती चली गई। वह व्यस्त रहने लगा फिर भी मैं बहाने बनाकर उससे जुड़ी रहती।
एक शाम उसने कहा,
“तुम बहुत उम्मीदें रखती हो मुझसे… मैं उतना अच्छा नहीं हूँ।”
मैं चुप रही। क्योंकि प्यार अक्सर आदमी को दार्शनिक बना देता है और चुप्पी स्त्री को और भी गहरा!
उस रात मैं देर तक जागी रही।
नींद आती थी, पर उम्मीदें करवट बदलती रही।
उम्मीदें… जिनका अपना धर्म होता है…टूटते हुए भी टिके रहना!
इस बार जाने क्या हुआ मैंने सोच लिया था जबरदस्ती जुड़ी नहीं रहूंगी। कठिन था लेकिन जरूरी भी!
फिर एक दिन, कुछ ऐसा हुआ जिसने मेरे सारे वर्षों की प्रतीक्षा को धूल झाड़ कर खड़ा कर दिया।
वह मेरे दरवाज़े पर था।
बारिश में भीगा हुआ, सांसें भारी, आँखें उलझी हुई।
मैं कुछ समझ पाती, उससे पहले उसने कहा—
“सुनो… एक बात कहनी है… आज कहनी ही है।”
मेरा दिल जोर – जोर से काँपने लगा!
वह करीब आया, खुद से भी ज़्यादा हक़ से मेरे सामने खड़ा होकर बोला-
“तुम मुझे याद आई! बहुत ज्यादा,हद से ज्यादा याद आई!”
मैं जड़ हो गई!
वह रुका।
“मेरा यकीन करो। बहुत… हर रोज़… जितना तुम्हें बताया नहीं, उससे कहीं ज्यादा। मैं कंजूस था… भावनाओं में।
पर… I am well Thinking of you Always.”
इन शब्दों का उच्चार जैसे मेरे समूचे इंतज़ार की गठरी खोल गया।मैं रो पड़ी! मुस्कुरा भी रही थी…अजीब है न पर दोनों साथ ही हुआ।
बहुत लोगों को कहते सुना था प्रेम दिखाने की चीज नहीं।
जिन्होंने भी ऐसा कहा है गलत कहा है! हम गुस्सा दिखा देते हैं,किसी को गाली देनी होती है तो स्वत: निकल जाती है फिर प्रेम से इतना गुरेज क्यों! आखिर प्रेम में क्यों इतना दुराव छिपाव!
उड़ने दो न प्रेम परिंदों को,भरने दो उड़ान,कहने दो न उसे भी…Am well thinking of you…Always
शुक्रिया🌼
हर बार की तरह बेहतरीन मौसमी। प्रेम वियोग में असीम… हर शब्द दिल में उतर कर दिल को भिगोता हुआ👏👏👏👏👏
अति सुंदर।