
डॉ. मुकेश गर्ग, असीमित, प्रसिद्ध व्यंग्यकार, गंगापुरसिटी
जब से मैंने हिंदी लेखन शुरू किया है, कई हिंदी के धुरंधरों की तीखी नज़रों से नज़र बचाते हुए घूम रहा हूँ। उन्हें ऐसा लगने लगा है कि मैंने उनका एकाधिकार छीन लिया है। मैं, जो अंग्रेज़ी दवा का डॉक्टर होकर सारी ज़िंदगी फिरंगी भाषा की चाकरी में लगा रहा, अब अचानक हिंदी भाषा में लिखने का क्या चस्का लग गया?
फेसबुक पर मेरे एक पुरातात्विक-कालीन हिंदी के गुरुजी जुड़े हुए हैं, जो मेरे हर एक लेख को बारीकी से देखते हैं। मुझे लगता है कि मेग्निफाइंग ग्लास का प्रयोग करते होंगे। ऐसा नहीं लगता कि मोबाइल में फॉण्ट को उँगलियों से ज़ूम करना भी उन्हें आता होगा! हमें ऐसा लगता है जैसे हम वापस स्कूल में आ गए हैं। बस फर्क इतना है कि इस बार क्लास स्कूल के हॉल में न लगकर फेसबुक की वॉल पर लग रही है।
गुरुजी का रहन-सहन, चाल-चलन, रंग-ढंग सब विशुद्ध हिन्दीमय है। खद्दर का कुर्ता ढंका बदन, उसके नीचे लटकी पतलून, बग़ल में आज भी अंग्रेजों के ज़माने से क्रांति का प्रतीक बना झोला लटकाए रहते हैं। झोले में इनकी हस्तनिर्मित , मेरा मतलब लिखित, दो-चार पुस्तकें पड़ी रहती हैं। कुर्ते की जेब से एक मोटा-सा फाउंटेन पेन झाँकता रहता है। चलते हैं तो एक पैर से लँगड़ाते हैं। ऐसा लगता है जैसे जब से हिंदी की टांग टूटनी शुरू हुई, इन्होंने दुखी होकर उसके साथ जन्म-जन्मांतर का साथ निभाते हुए अपनी एक टांग खुद ही तोड़ ली हो। बिल्कुल जैसे महाभारत काल में धृतराष्ट्र के अंधेपन को मैचिंग देने के लिए गांधारी ने आँखों पर पट्टी बाँध ली थी।
मोबाइल को भी वे अंग्रेज़ी भाषा की तरह निषेध मानते हैं। धर्म भ्रष्ट कर देने वाला… लेकिन क्या करें, हिंदी मातृभाषा की हम जैसे आततायियों से चौकसी जो करनी है, इसलिए मोबाइल का उपयोग करना उनकी मजबूरी हो गया है। अब हम ठहरे ढीठ लोग ; कागज़, कलम, दवात तो कभी का छोड़ चुके हैं।
दिन-रात उनका बीपी हिंदी की दुर्दशा देखकर ऊपर-नीचे होता रहता है। कहीं “अ” की मात्रा छूट गई, कहीं हलंत छूट गया, कहीं हिंदी की बिंदी लगनी थी, वह रह गई, कहीं अनुस्वार, तो कहीं वाक्य प्रयोग में गड़बड़ी! जैसे ही कोई व्याकरण या वर्तनी की अशुद्धि पकड़ में आती है, उनका हृदय चीत्कार कर उठता है। तुरंत उनकी टिप्पणी आ जाती है।
इन्हें मैं स्कूल टाइम से ही जानता हूँ। हिंदी के प्रकांड विद्वान रहे हैं, हिंदी इनके रग-रग में समाई है। यूँ तो हिंदी कालांतर में अपने सर्व-समावेशी भाव से जिस भी भाषा के संपर्क में आई है, उसे आत्मसात कर लिया है, चाहे वह उर्दू हो, अरबी हो, फारसी हो या अंग्रेजी! लेकिन इन्हें यह खिचड़ीकरण कतई पसंद नहीं!
हमारे ही विद्यालय में हिंदी के व्याख्याता थे, लेकिन बड़े दुखी रहते थे। दुःख इसी बात का था कि अंग्रेज़ों ने देश से सब लूट लिया और बदले में अपनी भाषा यहाँ छोड़ गए। इनके पीरियड में विद्यार्थियों की उपस्थिति भी 10 प्रतिशत ही रहती थी। एक बार तो इन्होंने सीधे ही अपना त्याग पत्र विद्यालय कमिटी को पकड़ा दिया। साफ़ कह दिया, “मुझे इन छात्रों को नहीं पढ़ाना, ये फिरंगी लोग हिंदी की इज़्ज़त करना नहीं जानते।”
बात भी सही थी। क्लास में जब हिंदी पढ़ाते थे, जितने छात्र क्लास अटेंड करते थे, वो सब वही होते थे जिन्हें क्लास के पंखे की हवा में नींद अच्छी आती थी। एग्जाम रिजल्ट में हमारे साइंस स्टूडेंट्स का हिंदी का ग्राफ हमेशा औंधे मुँह गिरा रहता। सबसे बड़ी समस्या थी कि स्कूल में विज्ञान विषयों के टीचर्स की ट्यूशन से अच्छी चांदी कट रही थी। इनके पास कोई ट्यूशन जैसी ऊपरी इनकम का सोर्स नहीं बना, इसलिए भी बड़े दुखी थे। हिंदी हमारी मातृभाषा है, यह रटाते थक गए लेकिन विद्यार्थी थे कि हिंदी की “मात-भगिनी” एकीकरण में लगे रहते थे!
वैसे इनका स्थानीय गिने-चुने हिंदी साहित्यकारों, रचनाकारों, कवियों आदि अभिजात्य वर्ग में सम्मान काफी अधिक था। सरकार भी इन्हें साल में एक बार सरकारी शॉल और दुपट्टा ओढ़ाकर हिंदी दिवस मना लेती थी।
इन्होंने हिंदी साहित्य पर 8-10 किताबें भी लिख डालीं। चूँकि सोशल मीडिया को ये अंग्रेज़ी प्रेमियों की रासलीला का मंच मानते थे, इसलिए कभी उसे अपनी पुस्तकों के प्रचार-प्रसार में उपयोग नहीं लिया। एक-दो पुस्तकों का विमोचन भी करवाया, कुछ साहित्य के धुरंधरों को बाहर से बुलाया गया था। वे इनका लिहाज करते हुए आ भी गए, सिर्फ़ टीए-डीए की एडवांस अदायगी पर। लेकिन कार्यक्रम में 150 लोगों का बनाया चाय-नाश्ता 10 लोगों को ही खिलाना पड़ा। तब से ये भरे हुए हैं।
कोई इनके सामने अंग्रेज़ी की एबीसीडी भी नहीं बोल सकता, उसे खूब लतियाते हैं। इसलिए लोग इनसे सामना करने से भी कतराते हैं! “अंग्रेजों की औलाद ने हिंदी की टांग तोड़ दी” – इनका पसंदीदा संवाद है। मेरे शहर के ही हैं, अभी “रिटायर्ड हर्ट” हो गए हैं, जी हाँ, रिटायर्ड नियमानुसार और हर्ट हालातानुसार!
धोखे से मेरे साथ फेसबुक पर जुड़ गए हैं। अब आपके गुरुजी की फ्रेंड रिक्वेस्ट आए और आप मना कर दो तो पता नहीं फिर से हमारी क्लास लग जाए! अब मुझे एक ज़िंदा मछली की तरह, न निगलते बनता है, न उगलते।
अब हम ठहरे साइंस के विद्यार्थी। इंग्लिश में भी कोई शेक्सपियर की औलाद तो थे नहीं, बस कुछ हिंग्लिश भाषा में संकटमोचक हनुमानाष्टक की तरह ‘चौरसिया’ जैसी किताबें थीं, तो नैया पार लग गईं। अब हिंदी में लिखने लगे, तो वैसे ही परेशान। हम वो त्रिशंकु हैं, जो अधर में लटके हैं। न तो हिंदी की मजबूत जड़ों से जुड़े हुए हैं, न अंग्रेजियत की आसमानी रंगीनियत को छू पा रहे हैं!
डॉक्टर की भाषा वैसे भी एक थर्ड जेंडर भाषा होती है, जो सिवाय फार्मेसिस्ट के किसी को समझ में नहीं आती। लेकिन हमने हिम्मत नहीं छोड़ी।
वो तो भला हो गूगल इनपुट टूल्स का, जो हमारी अंग्रेज़ी में लिखी हिंदी को देवनागरी फॉन्ट में बदल देता है। लेकिन उसे भी हिंदी की बिंदी का ख्याल नहीं रहता। कई बार ‘कुंती’ को ‘कुत्ती’ कर चुका है, ‘डंक’ को ‘डक’ और ‘डाकिया’ को ‘डाकिन’। अनुश्वार, हलंत, उपसर्ग, प्रत्यय की बात करें तो हाथ खड़े कर देता है। बोलता है, “भैयन, हामार से नहीं होगवा ई सब!”
बचपन गाँव में बीता था, तो वहाँ थी ठेठ आँचलिक भाषा। भाषा से ज़्यादा इशारों में बात होती थी। हिंदी के व्याकरण में “क, ख, ग, घ” सीखने में ही 4 साल लगा दिए थे! सच पूछो तो आज भी डर लगता है कि कोई हमसे हिंदी के स्वर-व्यंजन न पूछ डाले। बारहखड़ी तो स्लेटों में ही रह गई!
अब लिखने लगे हैं तो जो बोलते आए हैं, वही लिखेंगे न! कोई हमसे कहे कि साहित्यिक भाषा में लिखो, तो एक पेरा भी नहीं लिख पाएँगे, कसम से!
लेकिन लिखने लगे हैं, लोग हमें मज़ाक में साहित्यकार कह देते हैं। हम कहते हैं, “भाई, हमरा मज़ाक मत उड़ाओ। अब इतनी ज़िंदगी टूटी-फूटी हिंदी से गुज़ार दी, तो बाकी भी गुज़ार देंगे!”
अब थोड़ा लिखने की खुजली लगी है, तो थोड़ा खुजा लेने दीजिए।
बस इंतज़ार कर रहा हूँ हमारे हिंदी के मास्साब का। मेरे इस लेख की मीन-मेख निकाल कर बस अभी थोड़ी देर में मुझे देख लेने की धमकी देने वाले हैं!
थैंक्स