
रंजना किशोर, प्रसिद्ध लेखिका, नई दिल्ली
फैक्ट्री गंगा घाटी में बाढ़ की विभीषिका से बह गई। बाढ़ के समय एनटीपीसी की 520 मेगावाट रेस्क्यू परियोजना में न जाने कितने श्रमिक फँसे हुए हैं। राहत कार्य तेजी से चल रहा है। प्राकृतिक आपदा में फँसे श्रमिकों के परिवारों में त्राहि-त्राहि मची हुई है। लोचू के पिता का तीन दिन से कहीं पता नहीं है। लोचू, उसकी माँ, पत्नी और तीन बच्चों के भरण-पोषण की ज़िम्मेदारी पिता पर ही थी। माँ और पत्नी रो-रोकर बेहाल हैं। बच्चे भी सहमे हुए हैं।
लोचू दिन-रात भगवान के सामने खड़ा होकर पिता की सलामती के लिए प्रार्थना कर रहा है। घर में लगातार टीवी चल रहा है ताकि समाचारों में पिता की कोई खबर मिल सके। दो दिन हो गए, घर में चूल्हा नहीं जला। प्रार्थना करते-करते लोचू के कानों में खबर पड़ी –
“आज का ब्रेकिंग न्यूज़: एनटीपीसी अपनी परियोजना के निर्माण में लगी एजेंसी के मज़दूरों के परिवारों को 20-20 लाख रुपए का मुआवज़ा देगी।”
वहीं, राज्य सरकार और केंद्र सरकार ने भी चार लाख और दो लाख रुपए की धनराशि देने की बात कही है।
लोचू दौड़कर टीवी के पास गया। ध्यान से समाचार सुनकर वह अनुमान लगा रहा है – पूरे 94 लाख रुपए!
समाचार सुनकर वह फिर से भगवान के आगे नतमस्तक हो गया, लेकिन उसकी प्रार्थना में अब पिता की सलामती नहीं, बल्कि मुआवज़े की राशि शामिल थी।
भूख की हकीकत बयां की है रंजना जी आपने।
ओह्ह. . यथार्थ चित्रण 👌👌
संवेदनहीन समाज होता जा रहा है। कहानी समाज के विकृत रूप पर कटाक्ष करने में सक्षम है।