‘मन निर्मोही’

अपनी चोट को सहजता से
सहता था ये मन,
चोट लगी जब स्वाभिमान पर
असहज हुआ और सह न सका
आक्रोशित होकर अड़ गया था
न्याय पाने की उम्म्मीद में
सच्चाई और विनम्रता से
रखता गया था अपना पक्ष
माननीयों के समक्ष l

अपनी चोट को सहजता से
सहता था ये मन,
विश्वविद्यालय और सचिवालय में
सीढ़ियाँ चढ़ते-उतरते
डूबता, उतराता, गुमसुम होता
देख- देखकर पत्रावलियों में
दबा तड़फता, छटपटाता
और दम तोड़ता सच, फिर
बेबस होकर जार-जार रोता I

अपनी चोट को सहजता से
सहता था ये मन,
उम्म्मीद उसे मरने नहीं देती
और जीने नहीं देती
स्वाभिमान की चोट
अब वो समझ गया था
छल, प्रपंच, मौकापरस्ती
और झूठ में निहित खोट, लेकिन
सिद्धांतों को उसने छोड़ा नहीं था l

अपनी चोट को सहजता से
सहता था ये मन,
अंतिम उम्म्मीद के साथ
न्यायालय का दरवाजा खटखटाया, परंतु वहाँ भी
न्याय प्रक्रिया को बहुत सुस्त पाया
वो बातें बनाते और तारीखें बढा़ते अंतिम निर्णय की प्रतीक्षा में
अब मन निर्मोही हो गया है l

अपनी चोट को सहजता से
सहता था ये मन l

प्रो.डॉ.अंजना सोलंकी,

प्रसिद्ध लेखिका, बुंदेल खंड अभियांत्रिकी एवं प्रौद्योगिकी संस्थान,झांंसी

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