
रेणु परसरामपुरिया, प्रसिद्ध लेखिका मुंबई
सोचा न था कभी
जिंदगी में एक ऐसा पड़ाव होगा
न खुद का पता होगा ,
न किसी ओर का ठिकाना
किसी से पूछें तो भी क्या पूछें
हमें खुद ही पता नहीं
हमें किस की तलाश है
छूट गई मंजिल
छूट गई दिशा
छूट गया साथ किसी का
अकेले खड़े हैं राहों में
किसी हमसफ़र के इंतजार में
कोई आए ,थामें हाथ
ओर कहे
मैं ही हूं तुम्हारी मंजिल
मैं ही हूं तुम्हारा हमसफ़र
आओ चलें नई मंजिल की ओर।
Keep it up renu
Thnx Madhuji
Beautifully written.keep it up.more to go
एक निवेदन
रचनाओं पर प्रतिक्रिया देने के लिए आपका धन्यवाद, यह अवश्य हमारे साथियों का उत्साहवर्धन करेगी और नवसृजन के लिए प्रेरित करेगी. बस एक छोटा सा निवेदन है आप सभी से कि आप अपने शहर का भी उल्लेख कर देंगे तो हमें और हमारे साथियों को लगेगा की उनकी रचनाएं कहां-कहां तक पढ़ी जा रही है.
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