हेमा के तीन बच्चे थें।सबसे बडी़ लड़की माया फिर दो लड़के किट्टू और बिट्टू ।हेमा लोगों के घरों में बर्तन मांजने और झाडू पोछे का काम करती थीं ।कहने को पति था , लेकिन न होने के बराबर ।वह एक दूकान पर कपड़े सिलाई का काम करता था। हुनर था हाथों में ।सिलाई अच्छी कर लेता था।
लोगों की भीड़ भी लगी रहती थीं लेकिन शराब पीने की आदत ने उसे कहीं का न रखा।पीने के लिए रोज उसे दारू चाहिए ।दारू न मिले तो घर में नाटक शुरू।पत्नी को मारना पीटना ।बच्चों को डांटना फटकारना ।हेमा उसके घर आने से पहले बच्चों को खाना खिला देती थी और खुद भी थोड़ा बहुत खा लेती थी।न खाए तो दूसरों के घर का काम कैसे करेगी ।
पति के आने के बाद तो भोजन का एक निवाला भी उसके गले से नीचे नही उतरता था।तीनों बच्चे समझदार थे।सरकारी स्कूलों में पढा़ई करते थे।हेमा एक मराठी परिवार में बर्तन मांजने जाती थी।उसकी लड़की भी हेमा की लड़की माया की उम्र की ही थी।वह हमेशा अपनी बेटी के पुराने कपड़े माया के लिए दे देती थीं । माया भी खुशी – खुशी पहन लेती थी।एक बार हेमा माया को भी अपने साथ मराठी परिवार के घर ले गई ।माया को देखकर मराठी आंटी कहने लगी हेमा तेरी बेटी की उम्र मेरी बेटी के बराबर ही है लेकिन ये तो एक दम उससे चार साल छोटी लग रही है।ऐसा क्यों कोई बीमारी तो नही है ना। तब हेमा ने कहा मेडम ये दिन का खाना तो स्कूल से खाकर आ जाती है लेकिन इसके बाद मैं इसे आधा पेट ही खाना देतीं हूँ और कहकर रोने लगी।
जब मराठी आंटी ने कारण पूछा तो, हेमा कहने लगीं दोनों समय भरपेट खाना खायेगी तो जल्दी ही बडी़ दिखने लगेगी फिर मैं लोगों की नजरों से इसे कैसे बचा पाऊंगी।मैं इसकी चौकीदारी करुंगी तो काम से हाथ धो बैठुगी। आप देख रही है ना ये देखने में कितनी सुन्दर है।लड़कों को तो ज्यादा खाना देती हूँ ताकि वह जल्दी बडे़ हो जाए और कही मेहनत मजदूरी करके दो पैसें कमाकर लाए।
हेमा की बात सुनकर मराठी आंटी एक दम सोच में पड़ गई। कहा तो उसने सही था।आजकल बेटियां सुरक्षित कहां रह गई है।सुन्दर और गरीब लड़कियों की चिन्ता तो हेमा जैसी मां को ज्यादा ही बनी रहती है।काश कोई ऐसा कानून बन जाए जिससे हेमा जैसी मां अपनी बेटी की सुरक्षा को लेकर चिन्ता मुक्त हो जाए और उसे भरपेट खाना खाने दे।

रेणु लेसी फ्रांसिस , प्रसिद्ध साहित्यकार, इंदौर