
डॉ. मंजूलता, प्रसिद्ध लेखिका, नोएडा
बेटियाँ आँगन की रौनक होती हैं
चहकती, खिलखिलाती चिड़िया जैसी,
आँगन की धूप, वर्षा की फुहार जैसी,
बगिया के खिलते गुलाब जैसी,
जिसकी खुशबू से महकता है सारा घर।
माता-पिता की लाड़ली,
भाइयों की प्यारी बहना,
नाज़-नखरे करने वाली,
झगड़ा करने और मनाने वाली।
बचपन खत्म होते ही ऐसे समझदार हो जाती हैं
जैसे माँ-बाबा की भी दादी-नानी हों
उनका ख्याल ऐसे रखती हैं
जैसे कोई बड़े-बूढ़े रखते हैं।
दुःख तो तब होता है
जब घर से विदा होती हैं बेटियाँ।
माता-पिता का हृदय टुकड़ों में बिखर जाता है,
और बेटियाँ भी व्यथित मन लिए विदा हो जाती हैं।
अपने सारे खिलौने, गुड्डे-गुड़ियों को,
पिता की प्रिय कमीज़,
माँ की दी हुई पुरानी साड़ी,
दादी की दी हुई पायल,
भाइयों की राखी
सब सहेजकर एक संदुकची में रख जाती हैं।
कह जाती हैं
“कोई मत छूना… ये सब मेरा है।”
अपनी भावनाओं और संवेदनाओं को
साथ लिए चली जाती हैं।
ऐसी होती हैं बेटियाँ…