गणपति बप्पा मोरया!….
यह जयघोष जब गूंजता है तो वातावरण भक्तिभाव से भर उठता है. लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने जब 1893 में मुंबई में सार्वजनिक गणेशोत्सव की परंपरा शुरू की थी, तब इसके पीछे केवल धार्मिक आस्था ही नहीं, बल्कि एक गहरा सामाजिक और राजनीतिक उद्देश्य था. गुलामी की बेड़ियों में जकड़े भारतवासियों को एकजुट करने और स्वतंत्रता संग्राम की चेतना जगाने का यह एक सशक्त माध्यम बना. उस दौर में गणेशोत्सव ने समाज को जोड़ने, समानता और भाईचारे का संदेश देने का काम किया. यह एक ऐसा मंच बना जहाँ लोग एकत्र होकर अपने विचार साझा करते, राष्ट्रप्रेम के गीत गाते और स्वतंत्रता का सपना संजोते.

समय के साथ बदलता स्वरूप
आज गणेशोत्सव का स्वरूप पूरी तरह बदल चुका है. अब यह केवल आस्था का पर्व न रहकर भव्यता, प्रतिस्पर्धा और दिखावे का माध्यम भी बन गया है. हर गली और मोहल्ले में पंडाल सजने लगे हैं. एक महीने पहले से सड़कों के बीचों-बीच निर्माण कार्य शुरू हो जाता है और विसर्जन के कई दिन बाद तक पंडाल हटते नहीं. आमजन को यातायात जाम और असुविधा झेलनी पड़ती है. ढोल-नगाड़ों और डीजे की कानफोड़ू आवाज़ें रात देर तक गूंजती रहती हैं. आतिशबाज़ी से वातावरण प्रदूषित होता है. सोसाइटियों और मंडलों में आयोजित कार्यक्रमों में भक्ति गीतों के बजाय भद्दे गानों पर नाच-गाना होता है. खाने-पीने के स्टॉल्स के बाद बचा कचरा वहीं फैला रह जाता है.

यह देखकर प्रश्न उठता है क्या यह वही गणपति उत्सव है जिसे हमने परंपरा और संस्कृति की धरोहर समझा था? यदि कल्पना करें कि बप्पा स्वयं अपने पंडाल में बैठे यह सब देख रहे हों तो क्या प्रसन्न होंगे? शायद नहीं. वे उदास हो जाएंगे. गंदगी, धुएं, शोर और दिखावे के बीच बप्पा को भक्ति और शांति की कमी खलेगी. बप्पा को पूजा-पाठ और भक्तों का स्नेह प्रिय है, न कि ऐसा शोर-शराबा जिससे पक्षियों, बुजुर्गों और बीमार लोगों तक को कष्ट हो.
कुछ सोसायटियों और मंडलों ने सकारात्मक पहल की है. कुछ सोसायटियों द्वारा बच्चों को श्लोक, आरती और पूजा-विधि सिखाई जा रही है. बुजुर्गों के लिए अलग से ग्रुप बनाए गए हैं ताकि आपातकालीन स्थिति में उनकी देखभाल की जा सके. इसके साथ ही

स्वच्छता, पर्यावरण संरक्षण और समाज सेवा को उत्सव का हिस्सा बनाया जा रहा है. इसके लिए हमें भी हमारे स्तर पर प्रयास करने चाहिए हम गणेशोत्सव को शांतिपूर्ण, सादगीपूर्ण और समाजोपयोगी रूप दे सकते हैं. बिना ढोल-नगाड़े और शोरगुल के भी बप्पा प्रसन्न होंगे क्योंकि गणेशोत्सव केवल उत्साह का नहीं, जिम्मेदारी का भी पर्व है. बप्पा के स्वागत और विदाई का अर्थ केवल पंडाल सजाना और शोभायात्रा निकालना नहीं है, बल्कि समाज में प्रेम, सहयोग, स्वच्छता और संस्कारों का बीज बोना है.
यदि हम दिखावे से परे जाकर बप्पा को सच्चे मन से पूजें, बच्चों को संस्कार दें, बुजुर्गों का सहारा बनें और पर्यावरण को सुरक्षित रखें तभी गणेशोत्सव अपनी असली सार्थकता पाएगा.

मधु चौधरी, लेखिका, विल्सन कॉलेज मुंबई
सामयिक विषय पर सटीक टिप्पणी, लेखिका को बधाई। ऐसे ही अच्छे और सामाजिक सरोकार पर लिखती रहे।
बहुत सुंदर समसामयिक लेख
सार्थक सृजन।
मधुजी ने बहुत ही समसामयिक मुद्दा उठाया है आप लोगों ने उनका समर्थन किया. उसके लिए आभार
मधुजी ने बहुत ही समसामयिक मुद्दा उठाया है आप लोगों ने उनका समर्थन किया. उसके लिए आभार
मधुजी मैं आपके विचारों से पूर्णतः सहमत हूं। आधुनिकता की इस अंधी दौड़ में गणेशोत्सव का मूल स्वरूप कहीं खो सा गया है
So true
मधुजी ने बहुत ही समसामयिक मुद्दा उठाया है आप लोगों ने उनका समर्थन किया. उसके लिए आभार
बहुत-बहुत सार्थक लेखन… हम सभी को समझने की जरूरत है 🌺🙏
मधुजी ने बहुत ही समसामयिक मुद्दा उठाया है आप लोगों ने उनका समर्थन किया. उसके लिए आभार
मधुजी ने बहुत ही समसामयिक मुद्दा उठाया है आप लोगों ने उनका समर्थन किया. उसके लिए आभार
Wah madhuji…you have written d nowadays reality absolutely true…loved it…slowly all festivals are loosing original charm…together we can make change …aise hi likhte raho aur logon ko jagrut karo…
Pujan kriya sloko ke uchaar se ek theraav aata hai joh bacchho aur sabhi ko sikhana aur janana jaruri hai.. bahot badiya likha hai