बचपन

उषा शर्मा, जामनगर (गुजरात)

बहुत सुनहरे दिन थे मेरे
बचपन के वो प्यार भरे।
बड़ी नहीं थीं हसरतें कोई,
छोटी-छोटी खुशियों से सँवरे।

काग़ज़ की कश्ती बनाते,
पानी में बहती जब ठहरे,
हिचकोले खाती उन लहरों संग
मन में उठती उमंगों की लहरें।

ना रही वो कश्ती अब,
तकनीकी खेलों ने घेरे
मासूम, बातूनी दिलों पर
समझदारी के लग गए पहरे।

भूल गए नादान शरारतें,
दिखते बस प्रतिस्पर्धाओं के फेरे,
अल्हड़पन की उम्र में भी
क्यों लगते अवसाद के घेरे?

बरसात संग बहना चाहें
पर किनारों पर ही ठहरे,
भविष्य अँधेरों में डूबा-सा,
चारों ओर झूठे, फरेबी चेहरे।

बचपन चाहे पंख स्वच्छंद
आसमान में उड़ान भरे,
माता–पिता गर्व करें उस पर,
उत्तम मार्गदर्शन जो सदैव रहे।

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