
मधु मिश्रा, प्रसिद्ध लेखिका, कोमना, नुआपड़ा (ओडिशा)
“तान्या… वैसे तो ट्रेन में सेकेंड क्लास प्रायः सेफ़ ही रहता है, पर मुझे चिंता बच्चों की है। तुम अकेली जा रही हो, कहीं ये तुम्हें परेशान न करें…” पति अनुज ने कहा।
यह सुनते ही वहाँ खड़ी दस वर्षीय प्राची, अनुज के कंधों पर झूलते हुए बोली-“पापा, हम लोग मम्मी को बिल्कुल भी परेशान नहीं करेंगे। आप हमसे फ़ोन पर बात तो करते ही रहेंगे न? और प्रॉमिस करिए कि आप जल्दी आएँगे… आएँगे न, पापा?”
“हाँ बेटा, परसों की मीटिंग ख़त्म होते ही मैं आ रहा हूँ। और तुम बड़ी हो न… अपने छोटे भाई का भी ध्यान रखना, ठीक है?”
कहते हुए अनुज ने प्रणव और प्राची के गालों को प्यार से सहला दिया।
अब बच्चों को सीट पर बिठाते हुए तान्या ने एक नज़र अपने चारों ओर घुमाई आसपास कैसे लोग बैठे हैं। उनके ठीक सामने वाली सीट पर सिर्फ़ एक बुज़ुर्ग व्यक्ति बैठे थे, बाकी सीटें खाली थीं।
फिर सरसरी निगाह से तान्या ने उस बुज़ुर्ग का अवलोकन किया। चेहरे और कपड़ों से तो वे सभ्य ही लग रहे थे। उन्हें देखकर तान्या बच्चों की तरफ़ से निश्चिंत हो गई“ये तो मेरे पिता के समान हैं… अब डरने वाली कोई बात नहीं।”
सोचकर उसने सुकून भरी साँस ली।
थोड़ी देर बाद बच्चे भी सामने वाले बुज़ुर्ग व्यक्ति के साथ घुल-मिल गए और उन्हें “दादाजी, दादाजी” कहकर बातें करने लगे।
पर अनुज तो पत्नी और बच्चों को लेकर चिंतित था ही, इसलिए बार-बार तान्या से फ़ोन पर कहता रहा -“आसपास सब लोग ठीक हैं न, तान्या? मेरी मीटिंग न होती तो मैं ये रिस्क लेता ही नहीं। ख़ैर… तुम अपना और बच्चों का ध्यान रखना। किसी भी अपरिचित पर एकदम भरोसा मत कर लेना।”
“हाँ भई, हाँ… मैं सतर्क रहूँगी,” कहते हुए तान्या ने अनुज को आश्वस्त किया।
कुछ देर बाद बच्चे खाना खाकर सो गए, तो तान्या भी लेटकर पत्रिका पढ़ने लगी। पढ़ते-पढ़ते कब उसकी आँख लग गई, उसे पता ही नहीं चला। अचानक जब उसकी नींद खुली तो उसने देखा सामने वाला वही बुज़ुर्ग व्यक्ति प्राची के साथ कुछ असामान्य-सा व्यवहार कर रहा है।
एक झटके से तान्या अपनी जगह से उठी और चिल्लाकर बोली-“शर्म नहीं आती आपको! आपकी पोती के जैसी है ये। उम्र का भी लिहाज़ कीजिए। मान-मर्यादा को क्या बेच दिया है आपने? क्या आपके बच्चे नहीं हैं? अभी के अभी अपना सामान लेकर यहाँ से निकल जाइए, नहीं तो मैं पुलिस को बुलाती हूँ!”
क्रोध से तिलमिलाते हुए, हाँफती तान्या ने अपनी उँगली से बाहर की ओर इशारा किया।
तभी संयोग से टी.टी. भी वहाँ आ गया। उसे देखते ही हड़बड़ाकर वह बुज़ुर्ग बोला-“नहीं, नहीं… मैं अभी चला जाता हूँ।”
“अरे, दादाजी का स्टेशन तो अभी आया ही नहीं है। फिर आपने इन्हें सीट छोड़कर जाने के लिए क्यों कहा?”
विस्मयपूर्वक टी.टी. ने तान्या से पूछा।
तान्या ने लंबी साँस लेते हुए अपने बच्चों को दोनों हाथों के घेरे में समेट लिया और बोली-“सर, इन्होंने आज रिश्ता होने और रिश्ता दिखने के बीच का फ़र्क मुझे बता दिया।”
क्रोध से तमतमाया चेहरा और तान्या की गहरी-गहरी साँसें क्षण भर पहले हुए हादसे की गवाही दे रही थीं।
यह देखकर टी.टी. भी समझ गया कि मामला गंभीर है। ऐसे राक्षस से लड़ने के लिए दुर्गा कहीं भी आ सकती है, साहब वह भी अपनी संपूर्ण शक्ति के साथ। गंभीर भाव लिए टी.टी. के क़दम अब डिब्बे के दूसरे सिरे की ओर मुड़ गए।