
रीता मिश्रा तिवारी, प्रसिद्ध लेखिका, भागलपुर
प्रेम इंगित करता है मन को,
जब ही शब्द कतराएँ लवों पर आने से —
तभी
लिखी जाती है प्रेम-कविता..!
प्रेम में सिर्फ़ नदी या समंदर नहीं,
पहाड़ हो जाना भी प्रेम है..!
प्रेम में प्रेमी की प्रेमिका होना
आसान नहीं।
वह बन जाती है नदी —
और साथ में बहा ले जाती है सारी पीड़ाएँ।
प्रेम सिर्फ़ सागर की लहरें नहीं,
बहती है गंगा की निर्मल धारा..!
प्रेम सूर्य का ताप है, चाँद की शीतलता है,
मुनियों की तपस्या है, ऋषि का तप है,
हवन की अग्नि है, प्रेम बलिदान है,
त्याग है, शिव का तांडव है — प्रेम..!
बहुत बढ़िया
बहुत अभार 🙏🌹
बहुत अभार 🙏🌹
प्रेम की सुंदर व्याख्या