प्रेम

प्रेम हो जाना किसी प्राकृतिक आपदा से कम नहीं है।
प्राकृतिक आपदाएं मर्जी से नहीं आती।
जानबूझकर नुकसान नहीं पहुंचाती

नुकसान हो जाता है..
पहाड़ों पर घर बनाने वालों का
नदियों के किनारे बसने वालों का
तो कभी घर के घर मलबों में तब्दील हो जाते हैं
भूकंप के जोर के झटके से

और इन सब के बीच
प्रेम अपना रास्ता बना लेता है
जैसे लौट जाती हैं नदियां, अपने पुराने रास्तों पर
जिनको छीन लिया गया था
स्वयं की बसावट के लिए

जैसे धर्म के नाम पर बस गए हैं,
हिंदू और मुस्लिम
जो आपस में प्रेम नहीं कर सकते
दलित और स्वर्ण
इनमें प्रेम होना अपराध है।
गरीब के प्रति अमीर का प्रेम
गरीबी पर लांछन है।
एक मछुआरा है, जिसके जाल में फंसी है एक बड़ी मछली
और इस प्रक्रिया में प्रेम एक षड्यंत्र बन जाता है।

मैं नहीं जानती प्रेम क्या है
और दावे के साथ कह सकती हूं
प्रेम वह भी नहीं जो आप समझते हैं।
अनंत की परिभाषाएं जरूर हो सकती हैं असीमित
अनंत काल तक।

सुनो, प्रेम पूरा होने की वस्तु नहीं है।
इसका कोई अंत नहीं है।
समुंद्र की बूंदो का गणित बेमानी है।
तो प्रेम का गणित कैसे आसान हुआ?
यह गुणा-भाग का विषय ही नहीं।
हवा में घुला है
मिट्टी की सोंधी गंध में बसा है
सूरज का ताप है
आंखों का संताप है
चंद्रमा की रोशनी है
प्यासे को पानी से है प्रेम

पूरे ब्रह्मांड की स्याही पर निर्भर नहीं है
कि कोई भी लिख दे
चंद कागज़ के टुकड़ों पर प्रेम
मेरा उद्देश्य ना बताना,ना जताना, ना पूछना है
केवल खोज लाना है
किसी नई दुनिया के लिए
जो इस दुनिया के बाद होगी।
तब तक प्रेम की खोज हो चुकी होगी।

डॉ. प्रिया राणा
प्रसिद्ध साहित्यकार, नई दिल्ली

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