पोहे : स्वाद, परंपरा और देसी दिलों का मिलन

पोहे तो पोहे हैं। एक प्लेट खाकर पूरा दिन मस्ती से कट सकता है। उसमें यदि मराठी कांदा पोहे-बटाटे पोहे हों, तो कहने ही क्या?

पोहे को राई, हरी मिर्च, कडी पत्ते से बघार तैयार करो। प्याज -आलू डालकर भुन लो। मूँगफली पसंद हो तो वो भी डाल लो। फिर उसमें हल्के भीगे हुए पोहे डाल दो। उसमें हल्दी, नमक, हल्की सी चीनी डालकर पानी के छींटे से भाप दे दो। प्लेट में निकालकर ऊपर से धनिया, किसा हुआ नारियल, एक फांक नींबू और साइड में आम का अचार। आहाहा, लिखते-लिखते मुंह से पानी छूट रहा है। ये होते हैं अस्सल पोहे।
हाँ दडपे पोहे भी बनाकर देखना। बहुत स्वादिष्ट होते हैं।

अब तो एक्सपेरिमेंट के तौर पर कडक तर्री का रस्सा और पोहे, सांभर पोहे, मिसळ पोहे, उसळ पोहे और न जाने कितने तरह के पोहे मिलने लगे हैं। मगर हमें तो आज भी अपना ऑथेंटिक स्वाद बेहद पसंद है। कोई तो पोहे वडे भी बना लेते हैं।

आज भी मराठियों की शादी यही पोहे और चाय से नक्की होती हैं। सब खिला दिया और चाय-पोहे नहीं खिलाए तो लानत है बुलाने वाले पर।

ऐसे ही थोड़ी पोहे को भाव नसीब हुए हैं। दो दिलों का मिलन करवाने की ताकत है उसमें। तब उसके लिए हजारों-लाखों की धड़कन बनना कौन-सी बड़ी बात है।

तो सुनो! जैसे भी अच्छे लगे खाओ। सेंव डालकर खाओ, दही के साथ खाओ, जिसके साथ मन करे उसके साथ खाओ। हर बार बर्गर और पिज्जा खाना जरूरी थोड़े ही है। आज तो पोहे दिवस है। पोहे की माफिक सोचो। कुछ देसी हो जाए!

2 thoughts on “पोहे : स्वाद, परंपरा और देसी दिलों का मिलन

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    – सुरेश परिहार

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