पुणे, ३ दिसंबर
पिछले कुछ दिनों से पुणे की हवा और अधिक विषैली होती जा रही है. शहर के शिवाजीनगर, सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय परिसर सहित अनेक क्षेत्रों में वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) को खराब से अत्यंत खराब श्रेणी में दर्ज किया गया है. राष्ट्रीय प्रदूषण नियंत्रण दिवस की पृष्ठभूमि पर सामने आए ये आंकड़े पर्यावरण के प्रति प्रशासन की संवेदनशीलता पर बड़ा प्रश्न खड़ा करते हैं, ऐसी प्रतिक्रिया पर्यावरण विशेषज्ञों ने व्यक्त की है.
हर वर्ष दो दिसंबर को भोपाल गैस त्रासदी की स्मृति में राष्ट्रीय प्रदूषण नियंत्रण दिवस मनाया जाता है. वर्ष १९८४ में हजारों लोगों की जान लेने वाली उस काली रात ने देश को प्रदूषण के भयावह दुष्परिणामों का बोध कराया. इस वर्ष की हरित भविष्य के लिए शाश्वत जीवन इस संकल्पना के माध्यम से पर्यावरण-हितैषी जीवनशैली की आवश्यकता रेखांकित की गई है. भारत विश्व का पांचवां सर्वाधिक प्रदूषित देश घोषित हुआ है. राज्य के अनेक शहरों में पीएम २.५ और पीएम १० कणों की मात्रा खतरनाक स्तर तक पहुंच गई है.
पिछले कुछ दिनों में शहर के विभिन्न केंद्रों पर एक्यूआई के चिंताजनक आंकड़े दर्ज किए गए हैं. वर्तमान स्थिति ऐसे ही लंबे समय तक बनी रही तो नागरिकों में दमा, श्वसन विकार, हृदयरोग और फेफड़ों के रोग बढ़ने की आशंका विशेषज्ञों ने व्यक्त की है. शहर में बढ़ता वाहन प्रदूषण, निर्माण कार्यों से उडने वाली धूल और कचरा जलाने की प्रवृत्ति के कारण परिस्थितियां अधिक गंभीर होती जा रही हैं.
शहर की मुला-मुठा नदी का बिगड़ता स्वरूप भी चिंताजनक है. औद्योगिक अपशिष्ट, घरेलू कचरा, प्लास्टिक तथा मलजल के मिश्रण से नदी में ऑक्सीजन का स्तर स्वास्थ्यकर मात्रा से नीचे आया है. इसके परिणामस्वरूप जल की गुणवत्ता प्रभावित होकर ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में जलजनित रोगों की संख्या बढ़ रही है. महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण मंडल के अधिकारियों से इस संदर्भ में संपर्क करने का प्रयत्न किया गया, परंतु कोई रिस्पांस प्राप्त नहीं हुआ.
परिसर संस्था की वरिष्ठ प्रकल्प सहायक श्वेता वेर्णेकर ने कहा, शहर में बढ़ती वाहनों की संख्या, निर्माणस्थलों से उड़ती धूल और कचरा जलाने की बढ़ती घटनाओं से वायु की स्थिति अत्यंत गंभीर हो चुकी है. सर्दी के दिनों में अधिक आर्द्रता तथा धूलकण मिलकर धुंध बनाते हैं, जिससे प्रदूषक जमीन के समीप ही अटक जाते हैं और वायु गुणवत्ता तेजी से गिरती है.
प्रदूषण नियंत्रण सभी की जिम्मेदारी
प्रदूषण नियंत्रण की जिम्मेदारी केवल सरकार की नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक की भी है. परिवर्तन की शुरुआत घर से, स्वयं से होनी चाहिए. दैनिक जीवन में रसायनयुक्त वस्तुओं का उपयोग कम करके पर्यावरण-हितैषी विकल्प अपनाना समय की आवश्यकता है. समस्या उत्पन्न होने के बाद उपाय करने की अपेक्षा, समस्या उत्पन्न ही न हो, इसके लिए पहले से सजग कदम उठाना अधिक प्रभावकारी सिद्ध होता है.
डॉ. गुरुदास नुलकर, प्राध्यापक एवं संचालक, शाश्वत विकास केंद्र, गोखले राज्यशास्त्र एवं अर्थशास्त्र संस्था.
पुणे की वायु गुणवत्ता अत्यंत खराब