छोटा-बड़ा हर कोई इसकी चपेट में है
भेद नहीं करती सबकी दाढ़ी पेट में है
अजब-ग़ज़ब ढंग दिखे,आज के बाजार में
चंगू जी बिक गए, दिखावे के संसार में
खाने का स्वाद बचा न पहनने का तरीका
टीम-टाम में बिक गया, बंदे का सलीका
ऊ-आउच तक रह गई, मानव की सभ्यता
झूठे भ्रम में हो रही ये कैसी दुर्दशा
व्यर्थ नजाकत की धुंध में विचार हुए हैं लापता
दोगलेपन का रिवाज है भाई,
चरित्र का किसको पता
सीखने की कला ठीक है, पर ये कैसी तकरार
टूटी-फूटी अंग्रेजी,
जो जुबां पर करती वार
ज्ञान को भाषा से जोड़ना
कहां का इंसाफ है
बाहर क्या दिखाए तू,
भीतर बिगड़ा हिसाब-किताब है
आज के समाज का ये बदला कैसा चाल-चलन
अपने में ही सीमित तू,
अपने में ही है मगन

उमा पाटनी ‘अवनि’ वरिष्ठ साहित्यकार, पिथौरागढ़, उत्तराखंड
Bahut sundar👌👌
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Perfect as always ❤️….keep writing ❤️
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