
सुधांशु द्विवेदी, लेखक, बांदा (उत्तरप्रदेश)
“क्या करते हो आजकल?”
इस सवाल के डर से वो फिर घर नहीं जा पाया।
वो रह गया एक अजनबी शहर के एक कमरे में—कुछ किताबों, कुछ बर्तनों, मेज़ पर रखे टेबल लैंप और बहुत से अधूरे, धुंधले पड़ते सपनों के साथ।
वो रह गया इस सवाल के साथ कि एक और साल की मोहलत माँगी जाए या सपनों को यहीं छोड़ दिया जाए।
वो अब कतराने लगा है लोगों से मिलने में।
वो नहीं बता पाएगा कि अब तक कहीं चयन न हो पाने का जिम्मेदार उसके कहीं अधिक यह सिस्टम है।
वो नहीं कह पाएगा अपने दोस्तों से कि वह कम क्यों मिलता है।
वो हर त्योहार में यही सोचता है कि अगर ट्रेन की आरक्षण सीट कन्फ़र्म हो भी गई तो क्या सपने कन्फ़र्म हो पाएँगे या नहीं।
वो सामान बाँधता है, उठता है, खुश होने का अभिनय सीख गया है।
वो चलने को ही है, तभी अचानक कहीं से एक सवाल सुनाई देता है और वो ठहर जाता है, वापस बैठ जाता है उसी मेज़ के पास, इस सवाल के साथ कि—
“क्या करते हो आजकल?”
बहुत कम शब्दों में बड़ी सच्चाई
क्या करते हो आज कल? इस एक सवाल में छुपे होते हैं कई अनकहे सवाल। अति सुन्दर।