
डॉ.नेत्रा रावणकर, प्रसिद्ध लेखिका, उज्जैन
एक मधुर, सुरीली
दर्दभरी, मदहोश तान पर
मैंने बनाया है अपना घर।
महज़ चार दीवारें,
एक छत—नहीं है यह।
यहाँ भोर से संध्या तक,
संध्या से रात तक
बहता है संगीत—
मुक्त संवाद, त्याग, समर्पण,
रिश्तों के मूक बंधन।
पंछी-चिड़िया,
पेड़-पौधे, इंद्रधनुषी तितलियाँ,
संचरता है प्राणवायु,
विचरता है नादब्रह्म।
रंग-बावरी, गंध-बावरी
मिट्टी के बंध,
खुले रूपबंध,
नया निरामय कोश।
मैंने नहीं रखी कोई
काली मटकी टाँगकर छत पर,
मुझे विश्वास है…
आँधी, तूफान में भी
मैं बचा लूँगी घर को
और अपने आप को भी।
बस अब एक ही आस—
बहना है उस संत, शांत,
पनीली आँखों वाली
नदी की तरह,
समुंदर में मिलने की
चाह छोड़कर
एक नया समुंदर
बनने के लिए…