ग़ज़ल

प्यार से लबरेज़ दुनिया में

कोई गर दिल न हो

तब तो ये दुनिया भी शायद

रहने के क़ाबिल न हो

सूना सूना भूतिया सा मुझको

लगता अपना घर

जब तलक आँगन में कोई

बच्चों की खिल खिल न हो

बस चले जाना ही हर दिन

आदमी का शग़्ल है

कोई दिन उसका न होता

जब नई मंज़िल न हो

सिलसिला बर्बादियों का

कब थमेगा क्या ख़बर 

पर न हारेंगे ख़ुशी बेशक

हमें हासिल न हो

ज़िंदगी को बोझ कहता है बशर इतना बता

क्या ‘सना’ तू चल सकेगा

गर ख़ुदा हामिल न हो

बिट्टू जैन सना
प्रसिद्ध साहित्यकार मुंबई

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