प्यार से लबरेज़ दुनिया में
कोई गर दिल न हो
तब तो ये दुनिया भी शायद
रहने के क़ाबिल न हो
सूना सूना भूतिया सा मुझको
लगता अपना घर
जब तलक आँगन में कोई
बच्चों की खिल खिल न हो
बस चले जाना ही हर दिन
आदमी का शग़्ल है
कोई दिन उसका न होता
जब नई मंज़िल न हो
सिलसिला बर्बादियों का
कब थमेगा क्या ख़बर
पर न हारेंगे ख़ुशी बेशक
हमें हासिल न हो
ज़िंदगी को बोझ कहता है बशर इतना बता
क्या ‘सना’ तू चल सकेगा
गर ख़ुदा हामिल न हो

बिट्टू जैन सना
प्रसिद्ध साहित्यकार मुंबई