कभी-कभी मन चुपचाप पूछता है—
क्या मैं सही हूँ?
मेरे विचार, मेरे निर्णय,
मेरे कदमों की दिशा…
क्या यह सब उस सत्य की ओर बढ़ रहे हैं,
जिसे मेरी अंतरात्मा पहचानती है?
सही-गलत का मापदंड
दुनिया की दृष्टि से भिन्न हो सकता है।
लोग कभी ताली बजाएँगे,
कभी आलोचना करेंगे।
पर असली प्रश्न यही है—
क्या मेरी आत्मा शांत है?
क्या मेरी अंतरात्मा मुझे स्वीकार करती है?
यदि उत्तर “हाँ” है,
तो वही मेरा सही होना है।
क्योंकि अंततः,
सही और गलत का सच्चा निर्णय
बाहर से नहीं, भीतर से आता है।

शारदा कनोरिया “शुभा”, प्रसिद्ध कवयित्री, पुणे