
गायत्री बंका, प्रसिद्ध कवयित्री, मुंबई
इस ख़त का क्या करूँ,
इस मुहब्बत का क्या करूँ।
तुम आते नहीं मिलने,
इस फ़ुर्सत का क्या करूँ।
घंटों आईने में निहारती,
इस हरकत का क्या करूँ।
तुमसे बिछड़ने का डर सताए,
इस दहशत का क्या करूँ।
तुम्हारे इश्क़ में पागल हूँ,
इस लत का क्या करूँ।
तुम ही तो मेरी दुनिया हो,
इस विरासत का क्या करूँ।
दोस्त कहे — सब्र रख, गायत्री,
इस वकालत का क्या करूँ॥
Welcome Gaytri . Very well written
भावात्मक रचना…
” क्या करूं ” के प्रश्न बेहद सटीक हैं पर जवाब सिर्फ एक के पास । बहुत से प्रश्न अनुत्तरित भी रहें तो हम कभी नुकसान में नहीं रहते क्योंकि जवाब भी सुंदर बनाने में देर तो लगती है ।
सुंदर कविता
हौसला बढ़ाने के लिए आप सबका दिल से आभार 🙏🏼