
मंजूलता, प्रसिद्ध लेखिका, नोएडा
आज दोनों फिर पार्क की उसी बेंच पर बैठे, जहाँ रोज़ बैठते थे. जो आँवला पेड़ के नीचे स्थित थी। बैठते भी क्यों नहीं? उस जगह से उनका एक गहरा संबंध जो था। दरअसल सीमा और अर्जुन की मुलाक़ात इसी पेड़ के नीचे हुई थी।
रिवाज के अनुसार अक्षय नवमी के दिन दोनों के परिवार पिकनिक मनाने यहीं आए थे। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन आँवला वृक्ष के नीचे बासी खाना खाया जाता है। यहीं पर सीमा और अर्जुन के परिवार में दोस्ती हो गई। दो किशोर मन एक-दूसरे के प्रति आकर्षित हुए बिना नहीं रह सके। तब दोनों ही इंटर के छात्र थे।
इत्तफ़ाक से इंटर के बाद दोनों का दाख़िला एक ही कॉलेज में करा दिया गया।
प्यार का बीज, जो नाज़ुक अवस्था में कहीं दबा हुआ था, अब अंकुरित होने लगा। दोनों के विषय अलग थे, फिर भी समय निकालकर दोनों मिल ही लेते थे। एक-दूसरे को देखे बिना दोनों को चैन नहीं मिलता था। धीरे-धीरे दोनों में प्यार गहराता गया।
समय का पहिया इतनी तीव्रता से घूमा कि पाँच साल कब गुजर गए, पता ही नहीं चला। एम.ए. फ़ाइनल का रिज़ल्ट आ गया। दोनों अच्छे नंबरों से उत्तीर्ण हुए। लेकिन सीमा को अपनी सफलता से कोई ख़ुशी नहीं हो रही थी, क्योंकि वह जानती थी कि अब आगे पढ़ने की इजाज़त नहीं मिलने वाली है। उसके पिता जी कब से उसकी शादी कराने पर तुले हुए थे। वे कैंसर से जूझ रहे थे। चाहते थे कि घर की माली हालत के चलते सीमा का विवाह आवश्यक है, ताकि उसकी माँ पर अतिरिक्त बोझ न पड़े। सीमा से एक छोटी बहन और थी। पिता जानते थे कि वे चंद दिनों के मेहमान हैं।
उधर सीमा अर्जुन के प्यार में पागल हो चुकी थी। वह किसी और को अपना जीवनसाथी नहीं बनाना चाहती थी।
उस दिन जब वह अर्जुन से मिली तो बुझी-बुझी सी थी।
अर्जुन ने पूछा-“क्या बात है, सीमा? मैं तुम्हारी समस्या का निराकरण कर दूँगा।”
सीमा—
“समस्या तुम ही हो।”
अर्जुन मुस्कुराते हुए-
“मैं? मैं कैसे?”
सीमा-“क्या तुम नहीं जानते कि तुम्हारे सिवा अपने जीवन में कोई और स्वीकार्य नहीं?”
अर्जुन-“सब समझता हूँ। पर मैं स्वार्थी नहीं हूँ। मुझसे पहले तुम्हारे माता-पिता का अधिकार है। पहला प्यार उनका ही तुम्हें मिला होगा। उन्होंने तुम्हें पालने में कितने कष्ट उठाए होंगे। उन्होंने कितने सपने तुम्हारे लिए संजोए होंगे। मुझसे विवाह कर तुम उनके सपनों को चकनाचूर कर दोगी।
एक तो मैं गरीब, दूजे अभी अपने पैरों पर खड़ा नहीं हूँ। तुम्हें कोई सुख नहीं दे सकता। ऊपर से मैं तुम्हारी बिरादरी का भी नहीं। सोचो! ऐसी हालत में अगर हम उनके खिलाफ जाकर कोई कदम उठाते हैं, तो उनके हित में अच्छा नहीं होगा।”
“प्यार में दो तन का मिलन ज़रूरी तो नहीं। मन से मन, आत्मा से आत्मा का मिलन ही असली प्रेम है। फिर दूरी कैसे मायने रखेगी? दूर होकर भी हम क़रीब रहेंगे। तुम जब भी मुझे आवाज़ दोगी, मैं दौड़ा चला आऊँगा। उदास मत हो। माता-पिता के प्यार का कर्ज़ उतारो—ज़िंदगी में पहले प्यार देने वाले वही होते हैं।”
अर्जुन अपने प्यार को छिपाते हुए इतना कुछ कह तो गया, किन्तु कहते समय उसकी आँखें आँसुओं से भरी थीं। अंदर ही अंदर उसकी आत्मा रो रही थी।
दूसरे की ख़ुशी के लिए उसने अपने प्यार की कुर्बानी दे दी।
सही बात है, कभी कभी प्रेम की गहराई को त्याग से भी प्रमाणित कर सकते हैं।