
दिव्या सिंह, प्रसिद्ध लेखिका एवं वाइस आर्टिस्ट, नई दिल्ली
किसको कंधों पे ढोओगे,
किसको तुम पार उतारोगे?
मझधार में नैया डूबेगी,
तो किसको-किसको तारोगे?
क्या सबको साथ में मारोगे?
सब डूब गए तो क्या होगा,
फिर किस पे राज करोगे तुम?
तुम हुक्म चलाओगे किस पर,
किसका उद्धार करोगे तुम?
क्या तुमको ये एहसास नहीं,
तुम भी तो एक दिन हारोगे
क्या सबको साथ में मारोगे?
भारत के आँचल में सब हैं,
हर जाति-धर्म मिलता है यहाँ|
इसकी धरती में ताक़त है,
कीचड़ में कमल खिलता है यहाँ|
एक दिन ऐसा भी आएगा
अपनी ताक़त से हारोगे,
क्या सबको साथ में मारोगे?
जो आप कहें, वो सच होगा,
हम तो ग़रीब जन हैं साहब|
हम जात-पात को क्या जानें,
हम तो उज्जवल मन हैं साहब|
क्या इस चुनाव में भी हम पर
तुम आके डोरे डालोगे?
क्या सबको साथ में मारोगे?
Wah wah
Nice 👏👏
Gazab
🙏
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Bahut badhiya hai