कागज़ की कश्ती

शारदा कनोरिया शुभा, प्रसिद्ध लेखिका, पुणे

भीग गए हैं यादों के पन्ने, फिर से सावन आया है,
मन के कोने में छुपा बचपन, चुपके से मुस्काया है।

नाले की वो बहती धारा, और कागज़ की कश्ती,
न छोटा कोई सपना था, न थी कोई सस्ती बस्ती।

माँ की रसोई से फुरसत पा, जब घर से निकल आते,
बिना छतरी, बिना जूते, बारिश में खुद को भिगो आते।

दो पन्ने फाड़ किताबों से, एक नाव बनाते थे,
सपनों को रख बीचों-बीच, दूर समंदर तक बहाते थे।

कभी वो डूबती थी, तो हँसी आती थी खूब,
कभी बचा लेते थे उसको, जैसे कोई महायुद्ध।

अब ना वो बारिश वैसी है, ना वैसी दोपहरी,
ना वो दोस्त, ना वो नदियाँ, ना वो कश्ती सुनहरी।

कागज़ की कश्ती में जो उमंगें थी बचपन की,
आज बनी याद है उन दिनों की।

4 thoughts on “कागज़ की कश्ती

    1. धन्यवाद जी, बचपन हमारे साथ ही रहता है, उम्र कितनी भी हो जाये

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