
सुधा शर्मा, प्रसिद्ध लेखिका, कानपुर
कहाँ गए वो दिन,
जब रिश्ते निश्छल होते थे।
पैसा-रुपया कम था लेकिन,
सब खुशियों की फसलें बोते थे।
सगे-संबंधी से कम न थे तब,
गली-मुहल्ले वाले भी।
इक-दूजे के दुख में शामिल,
खुशियों के रखवाले भी।
पास-पड़ोसी इतने अपने,
कि सगे भी फीके पड़ जाएँ।
उनके घर अपने से लगते,
निःसंकोच हँसें, खेलें, खाएँ।
शोर-शराबा, केवल दिखावा,
जीवन के अब ढंग हुए।
सहज-सरल मुस्कानों वाले दिन,
बहुत दूर, बेरंग हुए।
विगत समय को याद करें हम,
मन ही मन मुस्काएँ।
कितनी यादें, कितने क़िस्से,
कैसे सबको बतलाएँ।
आज भी जब वो पल याद आएँ,
लगता जैसे सपना हो।
सगे-सगों की भीड़ में अब तो,
मिले न कोई अपना हो।