मैं खोजती कन्हैया,को राधे ,
घर , बहार ,देहरी सब द्वार
न जाने किन कुंज गलियन में,
छुपा हुआ वो ,मटकी फोड़ने आज ।।
निकट नहीं तनिक भी आवे ,
छलिया रोज ही छल जावे
मथ मथ माखन हुई बाबरी
न जाने कैसे वो भोग लगावे ।।
चोर–चोर के आवे घर भीतर ,
हंडिया से माखन ले जावे
पकडू कैसे तनिक सुझावों,
क्षण भर में वो अदृश्य हो जावे ।।
अब तो कोई युक्ति बतलाओ ,
माखन चोर को ढूंढ के लाओ
नंद बाबा से बात करो कोई
इस हृदय को चैन दिलवाओ।।

आशी प्रतिभा, ग्वालियर मध्य प्रदेश,