
डॉ. नेत्रा रावणकर, उज्जैन
युगों – युगों से संजोए सपने
कल्पना के अनंत आकाश में
भरते रहते हैं उड़ान
और उतरते हैं यथार्थ की
धरातल पर
फिर एहतियात कैसी?
नहीं चाहा था कुछ भी
बस एक मुट्ठी भर टुकड़ा
आसमां का,अपना-अपना सा
वो शबनम का कतरा
पल भर में बन जाता है दरिया
उतावला रहता है
तुम्हें छूने को
फिर एहतियात कैसी?
तैरने लगे प्रणय के सागर में
छूकर चाँद तारों को
पा लिया है सब
रातरानी महकने लगे
भोर का पारिजात
बरसने लगे तन – मन पर
फिर एहतियात कैसी ?
बहके-बहके से
महके-महके से हम
राह हो रंगीन- रोशन
खुशियोंसे भरा हो अंतर्मन
थाम लिया तुम्हारा दामन
फिर एहतियात कैसी ?