इल्तज़ा

डॉ. नेत्रा रावणकर, प्रसिद्ध साहित्यकार, उज्जैन

पंख थक गए तेरे तो एक बार मिलने आ तू,
मैं भी था कभी स्वच्छंद पंछी जैसा।

मत रोक आंसुओं के समंदर को,
बहने दे उसे सावन की झड़ी जैसा।

लिखे हुए खतों की सौगात कोई लौटाता है भला,
वो कमाल का जिगर ए यार होगा मेरे जैसा।

नहीं बदलती कहानी किताबों पर धूल जमने से,
मैं भी हूँ कभी पुरानी किताबों को पढ़ने जैसा।

कौन गया है आज तक इस मिट्टी के आगे,
मैं भी हूँ इस धूल के मुख्तसर ज़र्रे जैसा।

पता है लौटते वक्त नहीं ले जा सकते साथ में कुछ भी,
फिर भी बचा लो यारों, थोड़ा सरण और कफ़न जैसा।

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