कौन हूँ और क्या हूँ मैं?
खुद को कभी जाना नहीं,
खुद में खुद को खोजा बहुत,
पर खुद में खुद को कभी पाया नहीं।
कभी किसी सपने में, तो कभी आकांक्षाओं में,
कभी लफ़्ज़ों में भी खुद को पा लेती हूँ मैं।
क्या वजूद है मेरा?
हाँ, पा लेना चाहती हूँ
खुद में खुद को,
जिसे नकारती आई हूँ मैं।
जागृत हो उठती है सुषुप्त सी चेतना,
बार-बार फूट पड़ती हूँ नव-कोंपलों-सी मैं।
फैला देती हूँ अपनी
सारी चेतनाएँ और संवेदनाएँ,
पा लेना चाहती हूँ अपना नव-अस्तित्व।
और फिर एक दिन बन जाती हूँ विशाल वटवृक्ष,
जो अपनी जड़ों से
नित नई संभावनाओं को
अभिसंचित करती रहती है।

अर्चना मिश्रा, अश्क, प्रसिद्ध लेखिका, बोकारो (झारखंड)
लेखिका की अपनी सम्वेदना और अस्तित्व को किसी वटवृक्ष की तरह डालियों का धरती तक वापस जाकर अपनी जड़ों में ही सम्भावना की खोज करने जैसा है । अपने स्वयं का विस्तार करना बहुत अनूठा प्रयोग है ।
बहुत बहुत धन्यवाद विनीता जी 🌹
स्त्री का अस्तित्व वट वृक्ष की तरह विशाल और सशक्त है फिर भी हर बार हमें ही अपना अस्तित्व ढूँढना पड़ता है। बहुत सुंदर रचना