अधूरी ख्वाहिश..

मई की चुभती उमसती गर्मी वाले दिन की वो दुपहरी नीरवता से भरी थी। निधि के अंदर मरघट सा सन्नाटा छाया था। जिंदगी के अगले चौराहे पर किस परिस्थिति का सामना करना पड़ेगा, यह कहाँ सोच कर तैयार बैठा रहता है इंसान.. वर्तमान परिस्थिति के चक्रव्यूह से बाहर का सोच पाना बड़ी मुश्किल भरा काम होता है। खासकर निधि जैसी अल्हड़ मोरनी सी फुदकती उस औरत के लिए यह और भी दुरूह होता है, जिसका पति एक बड़े बाप का बिगड़ैल शराबी बेटा हो।सुदीप बनर्जी के अंतिम संस्कार की तैयारी चल रही थी। रिश्तेदार के नाम पर उनकी माँ, मामा और दो बहनों का परिवार आया था। पचास वर्षीय अविवाहित सुदीप के पिता कुछ महीने पहले ही गुजर चुके थे। एक माँ के लिए कुछ ही महीनों के अंतराल पर इस दूसरी अपूरनीय क्षति से उत्पन्न असहनीय वेदना को सह पाना और अपने आप को संभाल पाना बहुत मुश्किल प्रतीत हो रहा था।सब तैयारी के बीच अब प्रश्न यह था कि सुदीप जी को मुखाग्नि कौन देगा.. भांजे का नाम आगे किया गया। यही वह घड़ी थी, जिसे विधि के विधान ने निधि की परीक्षा के लिए तय किया था। 

         “सुदीप को मुखाग्नि मेरा छोटा बेटा सुजीत देगा।” निधि के इतना कहते ही कई जोड़ी ऑंखें एक साथ उसकी तरफ मुड़ी, इसमें एक जोड़ी आँखें उसके पति अमितेश की भी थी।

        “पागल हो गई हो।” कहते हुए वह निधि को खींचते हुए कमरे के अंदर ले गया!

         “आज ज्यादा सवाल मत करना, अभी तुम्हारे लिए इतना जानना काफी है कि सुजीत की रगों में सुदीप का रक्त प्रवाह हो रहा है और उसका यह नाम भी सुदीप की ही पसंद है। बाकी बातें बताने का अभी समय नहीं है मेरे पास” , कहकर वह बाहर आ गई “सुजीत आपके सुदीप का ही खून है, आँटी जी.. और सुदीप की इच्छा थी कि जब भी वह इस दुनिया से जाए, उसे मुखाग्नि सुजीत ही दे पर वह इतनी जल्दी चला जाएगा, यह कौन जानता था” , कहकर वह फफक उठी “तुम्हारी बातों पर यकीन कैसे करें हम, तुम्हारे जैसी दो टके की लालची औरत बहुत देखे हैं मैंने ! हमारे सुदीप के अविवाहित होने का फायदा उठाते हुए.. उसकी संपत्ति के लालच में तुम झूठ बोल रही हो, झूठी हो तुम.. उसे मुखाग्नि तो उसका भांजा वेदांत ही देगा।”खबरदार, जो किसी ने ऐसा करने की सोचा भी तो, फिर मेरे सुदीप को मैं तब तक रोक कर रखूंगी.. जब तक उसके बेटे सुजीत के डीएनए टेस्ट का रिपोर्ट नहीं आ जाता, एक घायल शेरनी की तरह निधि दहाड़ उठी। आप लोग यह क्यों नहीं सोच पा रहे कि इस स्वीकारोक्ति से मेरे पति से मेरा तलाक भी हो जाएगा और उसके पिता यानी मेरे ससुर के अरबों की संपत्ति से मैं वंचित हो जाऊंगी” , कह कर वह सुदीप के शरीर पर से टिका कर बैठ गई।

               अब तक जिंदगी में बात-बेबात चिल्लाने और शराब पीकर थप्पड़ चलाने वाला अमितेश, आज बुत बना सब सुन रहा था। आज पहली बार अमितेश रूपी पति के गैरत पर सीधा हमला होता दिख रहा था।

                दो वक्त की रोटी तथा पत्नी के हक और अधिकार के रूप में शारीरिक सुधा की तृप्ति करके पति के कर्तव्य की इतिश्री मान लेने वाले इंसान का नाम अमितेश था। इसके बाद उस बड़े बाप के बिगड़ैल शराबी बेटे के उत्श्रृंखलता पर बाहर वाली उन लड़कियों का हक था, जो कागज के चंद टुकड़े की खातिर अपना शरीर उसके सामने पेश करने को आतुर हुआ करती थी और उनकी आतुरता को अपनी उपलब्धि मानकर अमितेश शराब के नशे संग उनके शरीर की खुशबू में डूबा रहता। काम के बहाने कई-कई दिनों तक घर से गायब होकर अपने ही शहर में छिपा रहता, इस बात से बेखबर कि उसके इस भंवरे दिल से ठीक उलट, एक मनमीत उसकी कही जाने वाली अर्धांगिनी को भी मिल चुका है, जो उसकी गैरहाजिरी में उसके सुख-दुख का हिस्सेदार बनता है.. और जो आने वाले समय में उसे मिले पति नाम के तमगे की जडें उखाड़कर फेंक देने वाला है। तय हो चुका था कि अब मुखाग्नि सुजीत ही देगा क्योंकि इस नाजुक वक्त में अधिक बवाल सुदीप जी के घर वाले भी नहीं चाहते थे।

           अंत्येष्टि संपन्न हो चुकी थी, निधि अपने कुछ सामान के साथ अमितेश के घर को छोड़कर छोटे बेटे के साथ पास के एक होटल में रहने चली गई थी। बड़ा बेटा, जो अमितेश का खून था.. हॉस्टल में रहकर अपनी पढ़ाई पूरी कर रहा थाआज निधि को अपने उस फैसले पर फक्र महसूस हुआ, जब वह अमितेश से लड़ – झगड़कर दस से चार बजे तक की एक नौकरी ज्वाइन की थी सुदीप को उस हृदयाघात से गुजरे दस दिन होने को थे। हर विधि में वह समय पर पहुंच जाती थी, वहाँ हर किसी से अबोले रिश्ते को निभाती निधि अपने अनब्याहे रिश्ते की जिम्मेदारियों को बुत की तरह पूरा करती जा रही थी।बारहवां दिन था, सारी विधि पूरी हो चुकी थी.. रात के बारह बज चुके थे और सुजीत सो चुका था। निधि ने गाना लगाया.. 

सजी नहीं बारात तो क्या,

आई मिलन की रात तो क्या

ब्याह किया तेरी यादों से 

गठबंधन तेरे वादों से..

  आंखों से आँसू छलछला आए.. रात का वह सन्नाटा सीने में शूल की तरह चुभ रही थी, बाहर जागते रहो की आवाज और कुत्तों का भौंकना मस्तिष्क को एक दिशा में चलने में बाधित कर रही थी। सुदीप की तस्वीर लेकर वह सीने से चिपकाकर फफक पड़ी। कुछ देर बाद भी जब उसे नींद नहीं आई तो उसका मोबाइल लेकर देखने लगी। अचानक एक क्लिक और उसकी नजर एक रिकॉर्डेड ऑडियो क्लिप पर गई. निधि कौन कब तक इस दुनिया में रहेगा, कोई नहीं जानता। माना कि हमारी शादी नहीं हुई पर मुझे विश्वास है कि तुम दिल से अपने आपको बस मेरी मानती हो। अगर कभी मैं इस दुनिया में ना भी रहूं तो तुम मेरे नाम की सिंदूर लगाना.. जीते जी यह बात मैं तुमसे कभी नहीं कह पाया, इसलिए अपनी यह अधूरी ख्वाहिश इस ऑडियो में कैद कर रहा हूँ। पता नहीं यह तुम कभी सुन भी पाओ या नहीं, अगर सुन पाई तो इस मेरी इस ख्वाहिश को जरूर पूरी करना।”यह क्या.. क्या सुदीप को इस भावी अनहोनी का भान हो चुका था ? यह सोचते हीं निधि का शरीर कांपने लगा, वह बेड पर निढ़ाल सी बैठ गई। कुछ देर पश्चात वह पूरे ताकत और हिम्मत के साथ उठी, वाश बेसिन के पास जाकर अपनी मांग को रगड़-रगड़ कर धोया.. एक तौलिए से सुखाकर बूंद से तेल लगाई और फिर सुदीप के नाम का नया सिंदूर लगाकर, उसकी पसंदीदा ड्रेस पहनी और एक दुल्हन के ख्वाबों के साथ बेड पर जाकर लेट गई।

           आज वह पहली बार सामाजिक रिश्तो के प्रतीक.. सिंदूर संग अपने सुदीप की दुल्हन बन रही थी। जहाँ उसके अरमानों के साथ उसके सुदीप की यादों का संगम होने वाला था। इन गलियों से विचरते हुए वह कब सुदीप की बाहों में समाकर नींद की आगोश में लुढ़क गई, इन सब बातों से अनजान उसकी आंखें तब खुली, जब सुबह बजे बजे एक फोन आया, “रंजीत मुखोपाध्याय बोल रहा हूँ, सुदीप जी का वकील.. आप ग्यारह बजे उनके घर पर पहुंचिए, उनकी वसीयत लेकर आ रहा हूँ।”

निधि ग्यारह बजे सुजीत के साथ सुदीप के घर पर थी, परिवार के सदस्यों के सामने वसीयत पढ़ा जा रहा था। “मेरे नाम की हर चल-अचल संपत्ति की मालकिन निधि होगी और निधि के बाद उस संपत्ति का वारिस मेरा बेटा सुदीप बनर्जी होगा। मेरी माँ को किसी चीज की कमी नहीं है, वह अपने आप में बेहद समृद्ध हैं.. फिर भी एक बेटे की तरफ से उन्हें पचास हजार रूपए मासिक दिया जाए ! अब मेरी एक आखिरी अधूरी ख्वाहिश, अब तुम अपनी माँग में बस मेरे नाम की सिंदूर लगाना.. निधि, बिना इसकी परवाह किए कि मैं इस दुनिया में नहीं हूँ। तुम्हारा मेरा रिश्ता जीते जी सामाजिक मुहर का मोहताज नहीं रहा, अब मेरे मरने के बाद तुम इसी घर में रहोगी.. मेरी विधवा के रूप में नहीं बल्कि मेरी पत्नी, एक सुहागन के रूप में.. मेरी यह अधूरी ख्वाहिश पूरी करोगी मुझे यकीन है।”

         “आज का यह नया सिंदूर बस तुम्हारे नाम का है, सुदीप..” , कहकर निधि फफककर रो पड़ी सुदीप की माँ अपनी जगह से खड़ी हुई, निधि के पास आकर उन्होंने उसे अपने सीने से चिपका लिया, “आज से तुम मेरी बेटी हो और मुझे मासिक पचास हजार की कोई जरूरत नहीं.. पहले से बहुत कुछ है मेरे पास, अगर तुम चाहो तो अब कुछ दिन मैं तुम्हारे और अपने पोते के साथ इस घर में रहना चाहूंगी। मेरे बेटे के जाने का गम तो है मुझे, पर मैं आज उस चाहत से उबर गई हूँ कि मेरा सुदीप अविवाहित था क्योंकि सुजीत के रूप में उसका खून अब मेरे सामने है.. और हाँ, सुदीप के नाम का सिंदूर तुम पर खूब फब रहा है। दोनों की आंखों से आँसू झड़ रहे थे, जो एक रिश्ते को खोने और उसके ब्याज को पाने का प्रतिफल था।

मीनाक्षी सिंह, प्रसिद्ध साहित्यकार, वापी (गुजरात)

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