धारा और संकल्प


एक दिन कंकड़ों और पत्थरों ने मिलकर संकल्प लिया—
“अब बहुत हुआ!
हम मोड़ देंगे उस नदी की दिशा,
जो अब तक बेफिक्र चली जा रही थी,
अपने ही प्रवाह में मगन,
सब कुछ भिगोती, बहाती, संवारती।
अब वह नहीं बहेगी आगे की ओर,
उसे लौटना होगा,
वहीं जहां से चली थी—अपने उद्गम की ओर।”
पत्थरों ने एकजुट होकर बाँध बनाया,
कंकड़ों ने अपने छोटेपन को
संघ की ताकत में बदल दिया।
टीले उठने लगे, और टीले
पहाड़ बनने के स्वप्न देखने लगे।
लेकिन वह नदी…
वह तो ठहरी प्रवाह की साक्षात देवी।
उसके स्वभाव में ही लिखा था
आगे बढ़ते जाना।
ठोकरों से घायल होती रही,
पत्थरों की चोट सहती रही,
पर ठिठकी नहीं।
हर बाधा के सामने
उसने एक नया मार्ग खोज लिया,
नये रास्ते बनाए—
पथ तोड़, दिशा मोड़,
पर गति कभी न तोड़ी।
वह बहती रही…
कभी कल-कल, कभी छल-छल,
कभी गर्जना करती, तो कभी मौन सी।
रास्ते भर सबको देती रही—
प्यासों को जल,
सूखती जड़ों को संजीवनी,
खेतों को हरियाली,
और इंसानों को जीवन।
और अंत में, जब सारे पत्थर थक चुके थे,
जब सारे टीले धूल बन चुके थे,
नदी ने अपने अंतिम चरण में
समंदर को छू लिया।
वहीं थी उसकी मंज़िल — अनंत, विशाल और शांत।
नदी कहती है:
“तुम रोक सकते हो कुछ देर को,
पर नहीं रोक सकते मुझे हमेशा।
मुझे चलना है…
क्योंकि मेरा होना ही बहना है।
मैं बाधाओं को अवसर बनाना जानती हूँ।

डॉ. शशिकला पटेल असिस्‍टेंट प्रोफेसर आर. आर. एज्‍युकेशनल ट्रस्‍ट बी. एड. कॉलेज मुलुंड पूर्व मुंबई

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *