हरीतिमा

अनमनी सी गुजर रही थी,
करके पार ,घर आँगन का द्वार।
अनुपम करके रूप श्रृंगार,
हरीतिमा ने लिया पुकार।।

ऋतु- स्नेह से हो सिंचित ,
हरियाली थी चहुँ ओर ।
देव् -शिशु से हँसते थे,
नन्हें – नन्हें गुलमोहर।

नीम से लिपटी ,सद्य -यौवना,
अनचीन्ही सी वह लतर,
इतराती बढ़ती जाती ,
छूने को ऊंची ठहर।

बीते अंधड़ में धराशायी,
अशोक के अवशेष पर ,
हरष रहें नव किसलय ,
पुनः जीवन से भरकर !

नूतन पर्णो का लेकर हार,
महोगिनी बाहें पसार,
बल्लरियों को रहा पुकार ।

खड़ी बीच खर -पतवार ,
कदली सकुचाई सी,
ज्यूँ इक नवेली नार।

पथरीली धरती को फाड़,
उग आई पुनः एक बार,
बैंजनी फूलों की कतार।

जीवन देने को जीवन धर,
लिए जिजीविषा अपार,
पुनः उग आया है अवधूत ,
परित्यक्त -चौरा के दरार ।

यह संपदा – स्नेह उपहार,
पाया मैंने बिन व्यापार।
ध्वनित मन में बारंबार,
प्रिय कवि का वह उद्गार-
आ: धरती कितना देती है !
आ:धरती कितना देती है!

सुनिता सिंह, कवयित्री, कोलकाता

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