
हरकीरत हीर ,गुवाहाटी
ब्रह्मपुत्र के घाट पर बैठी मैं
अपने भीतर के तूफ़ानों को सुन रही थी।
नदी में जल नहीं, कोई प्राचीन स्मृति बह रही थी
जैसे हर लहर में कोई अधूरा नाम लिखा हो।
सांझ उतर रही थी, और हवा में गीली मिट्टी की गंध थी।
वो युवक धीरे से आया —
“बैठ सकता हूँ यहाँ?”
मैंने सिर हिलाया।
ब्रह्मपुत्र के किनारे जगह किसी को दे देना
जैसे अपने मन की चौखट खोल देना है।
वो बोला —
“कितना भव्य है यह प्रवाह,
जैसे धरती खुद बोल रही हो।”
मैंने मुस्कराकर कहा —
“है तो, पर सोचो,
कितनी नदियाँ छोटी होकर इसमें समाई होंगी,
कितनी बार पहाड़ों ने इसे रोका होगा,
कितनी बार बाढ़ बनकर लोगों ने इसे कोसा होगा
फिर भी ये बहती रही।”
वो चुप था।
मैंने आगे कहा —
“अगर यह बादलों में ही ठहरी रहती,
तो क्या हम इसे देख पाते?
नहीं न?
धरती तक आने के लिए,
बहने के लिए,
इसे गिरना पड़ा, टूटना पड़ा।
पर इसी टूटने में इसकी पहचान है।”
मैंने अपने हाथों को देखा
सांवले, पर मजबूत।
हर झुर्री जैसे किसी पुराने मोड़ का निशान।
“हर औरत के हिस्से में एक नदी होती है,”
मैंने धीरे से कहा,
“कभी भीतर, कभी बाहर।
वो भी बहती है,
कभी बाढ़ बनती है,
कभी शांत धारा।
लेकिन एक दिन सब पार कर लेती है
अपने ही सागर तक पहुँच जाती है।”
वो कुछ नहीं बोला —
बस मुझे ऐसे देखा जैसे नदी को देखा जाता है,
बिना कुछ पूछे, सब समझते हुए।
अब वो महीनों से मुझे फ़ोन करता है
अपनी उलझनों का किनारा ढूँढता हुआ।
और मैं बस मुस्कुरा देती हूँ।
क्योंकि उत्तर किसी किताब में नहीं,
नदियों में बहते हैं।
मैं स्वयंसिद्धा हूँ
क्योंकि मैंने अपने भीतर के ब्रह्मपुत्र को स्वीकार कर लिया है।
अब मुझे किसी सागर तक नहीं पहुँचना —
मुझे बस बहते रहना है….
Bahut satik jo युद्ध अंतर्मन में चलते है वो इतिहास में दर्ज़ नहीं होते।
अति उत्तम रचना