ब्लडी मून

photo - by mukesh garg

आख़िरकार ब्लडी मून दिख ही गया। शाम होते ही याद आया कि आज चंद्रग्रहण है—समय 9:58 से शुरू होगा। महीनों से धूल खा रही कैमरे की बॉडी और लेंस को आज धो-पोंछकर तैयार किया गया। मन में ख्याल आया कि जैसे ही घड़ी 9:58 बजेगी, चाँद तुरंत ही लाल हो जाएगा। पर ऐसा कहाँ!

10 बजे छत पर पहुँचे, बड़ी मुश्किल से श्रीमती जी को भी तैयार किया। उन्हें तो सिर्फ़ चौथ के चाँद से मतलब रहता है; इस ब्लडी मून से उनका कोई सरोकार नहीं। ऊपर देखा तो चंद्रमा पर थोड़ा-थोड़ा ग्रहण लग चुका था। मन में पुरानी पौराणिक कथाएँ घूम गईं—हरी अनंत, हरी कथा अनंता। इस कथा को अलग से बोनस पोस्ट के रूप में साझा करूंगा।

सामने का दृश्य ऐसा था मानो चाँद धीरे-धीरे किसी अदृश्य परछाईं में समाता चला जा रहा हो। चारों ओर चाँदनी की बिखरी रोशनी थी। हमारा कैमरा भी हिलती-डुलती हथेलियों के बावजूद स्थिर भाव से अपनी तस्वीरें खींचता रहा।

सोचा—जब पूरा चाँद ढक जाएगा तो यह ब्लडी मून कहाँ से निकलेगा? संदेह दूर करने गूगल बाबा की शरण ली। उन्होंने समझाया—“धैर्य रखो बच्चा, चाँद तुम्हें लाल नज़र आएगा 11 बजे के आसपास।” हम नीचे लौट आए। श्रीमती जी इस बीच हमें इस खोज-अभियान में अकेला छोड़कर नींद की आगोश में जा चुकी थीं।

हमने सोचा, क्यों न Zigmato मूवी पूरी कर ली जाए। फिल्म गिग वर्कर्स की समस्याओं पर थी—शायद इस विषय पर पहली बार कोई फिल्म बनी हो। लगा जैसे कार्ल मार्क्स की भविष्यवाणियाँ सच हो रही हों। मज़दूर की दुर्दशा अब इस डिजिटल नवउदारवाद के ज़माने में गिग वर्कर्स की अजनबीयत बन चुकी है। खैर, इस पर चर्चा फिर कभी करेंगे।

करीब 1 बजे दोबारा कैमरा, किट और सुपर ज़ूम लेंस लेकर छत पर पहुँचे। अब घुप्प अँधेरा। चाँदनी लील ली गई। थोड़ी देर तो हम अपनी आँखों की पुतली को चौड़ा कर के उल्लू बने खड़े रहे। वहाँ का दृश्य अद्भुत था—आसमान धुंधला, पर चाँद एकदम लाल, शापित-सा। ऐसा लग रहा था मानो कोई सफेद फल छीलकर उसका लाल गूदा बाहर निकल आया हो।

तभी याद आया—ट्राइपॉड तो नीचे कमरे में पड़ा है, और श्रीमती जी को जगाना मतलब गहरी नींद में सोए चाँद-से चेहरे को लाल होते देखना… जो हमें मंज़ूर नहीं था।

ISO 3200 पर वाइड अपर्चर किया, पर शटर स्पीड मिली 0.3 सेकंड। एक्सपोज़र कंपन्सेशन -3 करने के बावजूद, 600mm टेलीफोटो लेंस को हाथ में संभालकर 1/1000 सेकंड की स्पीड चाहिए होती है—तब जाकर सही स्थिर तस्वीर मिलती है। अब हम कहाँ संभाल पाते!

iPhone से कुछ शॉट लिए, कुछ कैमरे से। और फिर जुगाड़ लगाया—कैमरे को छत पर लगी डिश ऐन्टेना की डंडी पर टिकाकर जैसे-तैसे तस्वीरें खींच डालीं। शुक्र है, चाँद से पहले कोई कॉन्ट्रैक्ट साइन नहीं हुआ था, वरना हमारी तस्वीरें देखकर वह और भी बिगड़ जाता—लाल का और लाल हो जाता।

तो इस तरह जैसे-तैसे उस ब्लडी मून की कुछ तस्वीरें इतिहास में कैद हो ही गईं।

डॉ. मुकेश गर्ग, प्रसिद्ध व्यंग्यकार, गंगापुर सिटी (राजस्थान)

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