त्यौहार

मनवीन कौर पाहवा, वरिष्ठ साहित्यकार, मुंबई

हल्दी कुमकुम का त्यौहार फिर से आया

सुहागिनों ने श्रृंगार किया , गजरा सजाया 

माथे पर बिंदी ,पहनी हरि हरि चूड़ियाँ 

हाथों में मेहंदी और गोटा लगी साड़ियाँ ।

पर उस विधवा ने न पहनी चमकीली साड़ी 

ना सजाया टीका थे हाथ भी ख़ाली 

इक बहन जो थी पति की सताई 

छोड़ उस दरिंदे को घर वापस चली आई 

सगुना भी रह गई थी बिन ब्याही 

ग़रीब बाबा ना कर पाये उसकी सगाई ।

ना हाथों में मेहंदी थी उन के , ना पावों में पायल 

ना चूड़ी की खनक , थीं सब भावों से घायल 

उन्हें हल्दी कुमकुम में जाने की थी मनाई 

सब थीं बेरंग गुमसुम मुरझाई 

वेदना की बूँदें थीं आँखों में समाई ।

मेहंदी सजे हाथ वह भी तो चाहते हैं 

पायल और काजल उन्हें भी तो भाते हैं

क्यों ये तीज त्यौहार पति से जोड़े जाते हैं?

क्या पति भी कोई त्यौहार पत्नी के लिए मनाते हैं 

पुरुषों पर तो कोई बंधन नहीं लगाएं जाते हैं । 

क्यों फिर बिन पति के, स्त्री को अभागन बताते हैं ?

क्या उन्हें ख़ुश रहने का अधिकार नहीं है ?

क्यों उनके लिए हल्दीकुमकुम एक त्यौहार नहीं है.

मथती हैं हृदय को ये भेद भाव की बातें 

अरमानों को रौंदती शुष्क पवन सी रातें ।

एसी ही एक प्रथा सती की भी चली थी

जब एक अभागन ज़िंदा जली थी ।

चलो मिलकर परिवर्तन की मशाल जलायें 

बोझिल समाज में कुछ बदलाव लायें  

व्यर्थ की बातों से दूर हो जाएँ 

विधवा , सधवा , त्यक्ता जैसा कोई संबोधन ना हो

सभी त्यौहारों पर हर इक का समान हक हो

तभी होगी सुरभित रंग भरी क्यारियाँ 

जब पुरुष प्रधान समाज में

सम्मानित होंगी सभी नारियाँ ।

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