त्याग, संघर्ष और चिरनिद्रा

पिताजी के मुंबई जाने के बाद हमारा जीवन और भी मुश्किल हो गया। माँ ने आसपास के घरों से कपड़े लाकर सिलाई का काम शुरू किया। कुछ महीनों बाद पिताजी को वहाँ चौकीदार की नौकरी मिल गई। तब वे घर कुछ पैसा भेजने लगे। धीरे-धीरे पिताजी अच्छी रकम भेजने लगे। मैं बड़ा हुआ तो पिताजी ने मुझे पढ़ने के लिए पास ही के शहर में भेज दिया।

बाबूजी को बहुत कम छुट्टी मिलती थी। जब भी घर आते, हमें मुंबई के किस्से सुनाया करते। एक बार उन्हें माँ से बात करते हुए मैंने सुना, तब पता चला कि पिताजी वहाँ 24 घंटे चौकीदारी करते हैं। 12 घंटे की नौकरी की पगार में मेरी पढ़ाई का खर्चा उठाना संभव नहीं था। जब उन्होंने अपनी समस्या अपने मालिक को बताई, तो मालिक ने उन्हें दिन की ड्यूटी के बाद रात की ड्यूटी भी दे दी। रात में लोगों का आना-जाना कम होता था, इसलिए अब पिताजी 12-12 घंटे की दो ड्यूटी करने लगे।

रात 1 से 4 बजे के बीच मुश्किल से 2-3 घंटे की नींद ले पाते। ड्यूटी बदलने के बीच उन्हें इतना ही समय मिलता कि नहा लें और जल्दी-जल्दी खाना खा लें। रहने के लिए बस चौकीदार का केबिन था, जहाँ एक थैले में उनकी दो जोड़ी कपड़े रहते। कपड़ों की ज़रूरत कभी-कभार ही पड़ती, क्योंकि पूरा दिन तो चौकीदार की यूनिफॉर्म में ही गुजर जाता। यह सब सुनकर मैं बहुत हैरान और परेशान हुआ। मैं सोचने लगा—अगर एक रात भरपूर नींद न मिले तो हम अगले दिन थकान से टूट जाते हैं, पर पिताजी तो यह काम महीने के तीसों दिन करते थे।

माँ से बात करते समय उन्होंने बताया था कि कभी-कभी दिन की ड्यूटी में उन्हें झपकी आ जाती है, तो लोग बहुत डाँटते हैं। यह सिलसिला चलता रहा। दो-तीन साल में ही दादा-दादी गुजर गए। एक साल बाद मेरी बहन सुमन की शादी हुई। शादी के कर्ज़ को चुकाने के लिए पिताजी ने छुट्टी लेकर गाँव आना भी छोड़ दिया।

माँ उनके आने का इंतज़ार करती रहती, पर माँ का इंतज़ार अधूरा रह गया। एक दिन छत पर कपड़े सुखाते समय न जाने कैसे वह नीचे गिर गईं और अस्पताल पहुँचने से पहले ही उनका निधन हो गया। माँ की मृत्यु ने बाबूजी को तोड़ दिया। अब वे मुझ पर शादी का दबाव डालने लगे।

मैंने उन्हें आश्वासन दिया कि अच्छी नौकरी मिलते ही उनकी पसंद की लड़की से शादी कर लूँगा। भगवान की कृपा से मुझे एक अच्छी फर्म में नौकरी मिल गई। छह महीने बाद ही पिताजी ने सीमा से मेरी शादी कर दी। अब मैं पिताजी से कहने लगा कि आप नौकरी छोड़कर हमारे साथ ही रहिए। लेकिन पिताजी बोले—”अब इस जीवन की आदत-सी हो गई है, थोड़ा और कर लूँ।”

पर लगातार वर्षों तक अपर्याप्त नींद से उनका स्वास्थ्य बिगड़ने लगा। इस बार मैंने साफ कह दिया—”अब आप नौकरी छोड़कर मेरे साथ रहेंगे।” बाबूजी मेरी बात मान गए। यह जानकर मेरी खुशी का ठिकाना न रहा। मैंने और सीमा ने सोचा—अब हम बाबूजी की सेवा करेंगे, उन्हें पूरा आराम देंगे। सुबह वे सैर पर जाएंगे और दिन अपनी मर्जी से बिताएँगे।

तभी अचानक ट्रेन के आने की घोषणा हुई और मैं विचारों की तंद्रा से बाहर आया। बाबूजी को लेकर घर की तरफ चला। सीमा चाय और पकौड़े बनाकर इंतज़ार कर रही थी। खाना खाकर हम बाबूजी के साथ बैठ गए और मुंबई के किस्से सुनने लगे। सीमा उनके संघर्ष को जानकर अचंभित रह गई। उसने कहा—”कोई इंसान इतने वर्षों तक बिना नींद के कैसे रह सकता है?”

बाबूजी मुस्कुराए और बोले—”अब तुम लोग जाकर आराम से सो जाओ। मैं भी सोता हूँ। अब मेरे जीवन में कोई चिंता शेष नहीं। अब मैं शांति से सोना चाहता हूँ।”

हम सब बहुत खुश थे। पर यह खुशी ज़्यादा दिन न टिक सकी। एक दिन सुबह जब सीमा चाय देने गई, तो आवाज़ लगाने पर भी बाबूजी ने कोई प्रतिक्रिया न दी। वह घबराकर मुझे बुलाने लगी। मैं दौड़कर पहुँचा तो देखा—बाबूजी हमेशा-हमेशा के लिए चिरनिद्रा में सो चुके थे।

मैं बिलख-बिलख कर रो पड़ा—”आपने अपना पूरा जीवन लगा दिया और मुझे अपनी सेवा का अवसर बहुत कम दिया।”
लेकिन बाबूजी का शांत मुख मानो कह रहा था—”मैं बहुत थक गया हूँ, मोहन। अब मुझे शांति से सोने दो।”

मधु चौधरी, लेखिका, विल्सन कॉलेज, मुंबई

6 thoughts on “त्याग, संघर्ष और चिरनिद्रा

  1. बहुत ही अच्छा लिखा है मधु पढ़कर आंखों में आंसू आ गए यह कितने ही लोगों की कथा है जो बड़े शहरों में आकर अपनी रोजी-रोटी कमाते हैं।

  2. मुंबई में रहनेवाले हजारों लाखों पिताजी का सटीक जीवन संघर्ष। सुन्दर रचना

    1. बहुत ही मार्मिक और सुंदर कहानी है। यही जीवन की सच्चाई भी है।

  3. माता – पिता के लिए जीवन भर आदर करना बच्चों के लिए बहुत जरूरी है । उनका त्याग कभी चुकाया नहीं जा सकता ।
    बहुत मार्मिक सत्य कथा ।

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