तिरंगा – हमारा मान

भारत में “तिरंगा” शब्द भारतीय राष्ट्रीय ध्वज को संदर्भित करता है। हर स्वतंत्र राष्ट्र का अपना ध्वज होता है, जो उसकी स्वतंत्रता का प्रतीक है। भारत के राष्ट्रीय ध्वज को उसके वर्तमान स्वरूप में 15 अगस्त 1947 को अंग्रेजों से भारत की स्वतंत्रता से कुछ दिन पहले, 22 जुलाई 1947 को आयोजित संविधान सभा की बैठक के दौरान अपनाया गया था। यह 15 अगस्त 1947 से 26 जनवरी 1950 तक भारत के राष्ट्रीय ध्वज के रूप में और उसके बाद भारत गणराज्य के राष्ट्रीय ध्वज के रूप में कार्य करता रहा।

26 जनवरी 2002 को भारतीय ध्वज संहिता में संशोधन किया गया और स्वतंत्रता के कई वर्षों बाद भारत के नागरिकों को अंततः किसी भी दिन अपने घरों, कार्यालयों और कारखानों पर भारतीय ध्वज फहराने की अनुमति मिल गई—केवल राष्ट्रीय दिवसों पर ही नहीं, जैसा कि पहले होता था। अब भारतीय गर्व से कहीं भी और किसी भी समय राष्ट्रीय ध्वज फहरा सकते हैं, बशर्ते तिरंगे के किसी भी अनादर से बचने के लिए ध्वज संहिता के प्रावधानों का कड़ाई से पालन किया जाए।

यह तिरंगा ध्वज हममें राष्ट्रीयता की भावना को पोषित करता है। जब तिरंगे को समूह में फहराया जाता है, तो यह भारतीयता के भाव को और उन्नत करता है।

परंतु हम भारतीय जितने जोश से ‘जय हिंद’ और ‘वंदे मातरम’ के नारे लगाते हैं, उतना ही उदासीन रवैया इसके सम्मान और इसकी साज-संभाल के प्रति रखते हैं। भारत सरकार ने इस राष्ट्रीय प्रतीक को चंद इमारतों तक सीमित न रखकर जनसाधारण को किसी भी दिवस पर घरों से फहराने की अनुमति दी है, तो इस अधिकार के साथ इसके सम्मान के प्रति हमारे कर्तव्य भी उतनी ही तत्परता से निभाए जाने चाहिए।

15 अगस्त की शाम से ही कुछ ध्वज यहाँ-वहाँ सड़क के किनारे या बेतरतीब रखे हुए दिखाई देते हैं। याद रहे कि तिरंगे से शहीदों की अमर गाथा जुड़ी है—जिन्होंने इसे फहराने की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए।

उनके बलिदान का सदा सम्मान करें। तिरंगा ध्वज का कभी अनादर न करें और न करने दें। घरों में, संस्थाओं में, विद्यालयों में, सार्वजनिक स्थानों पर हर भारतीय नागरिक को तिरंगे का मान रखने का संदेश दें।
देशवासियों के नाम यही एक आह्वान है।

शैली भागवत ‘आस’ इंदौर

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