
साइनासिंह, लेखिका, जयपुर
कुछ महल जो खंडहर हो गए,
कभी उनमें रौनक और रोशनी गूंजती थी,
दीवारों पर तस्वीरें मुस्कुराती थीं,
झरोखों से सपनों की हवाएँ बहती थीं।
आज वही महल वीरान खड़े हैं,
दरारों में घास उग आई है,
सन्नाटे में बस हवा गूंजती है,
जैसे वक्त सब कुछ चुपचाप चुरा ले गया हो।
कभी कदमों की आहट से भरता था आँगन,
अब धूल और पत्थरों की चादर बिछी है,
कभी राग–रंग की महफ़िल सजती थी,
अब बस यादों की राख रह गई है।
ये खंडहर सिर्फ पत्थर नहीं हैं,
ये समय के साक्षी हैं,
बताते हैं—वैभव भी मिट जाता है,
लेकिन इतिहास हमेशा जीवित रहता है।