अजब दौर है…

नमिता गुप्ता, लखनऊ (उ.प्र)

” सरल बेटा, क्या हाल है तुम्हारा।”
मैं ठीक हूँ दादाजी । अभी मै कालेज में हूँ। टेक केयर दादा जी… मैं फोन रखता हूँ।”
विजय ने अपने मित्र को फोन मिलाया “हेलो!! गगन तू कैसा है ?”
“यार ,मैं ठीक हूँ, तू अपनी बता।”
” क्पा बताऊ यार,बुढ़ापे में जोड़ों में दर्द रहता है। कुछ भी हिम्मत नहीं पड़ती करने की।मन होता है किसी का सहारा हो, बात करें,पास में बैठे, तो यह अकेलापन भी दूर हो लेकिन। “
“तू सही कह रहा है यार … इस उम्र में कौन पास में होगा, खुद को ही अपना ध्यान रखना होगा। अब तो तुझे ही अपना ध्यान रखना। मुझे भी थोड़ा काम है। फोन रखता हूँ। “
विजय ने अपने बेटे को फोन मिलाया “पिताजी आप टाइम बे टाइम फोन मिला देते हैं। इस समय मैं ऑफिस में हूँ। “
“अरे बेटा! तुझसे बात करने का मन हो रहा था।”
सरल के कहने से पहले ही ” पापा,पैसा तो भेज देता हूँ। आप अपने डॉक्टर को दिखाइए।अपना इलाज कराए। मैं यहाँ पर हूँ तो क्या कर सकता हूँ। बस आप अपना ध्यान रखिए ।” कहते हुए फोन रख दिया
सबका एक ही ब्रह्म वाक्य सुनकर विजय ने फोन उठा कर एक तरफ रख दिया। फोन बात करने की सुविधा ही देता है मगर इससे अकेलापन दूर नहीं करता है। जिससे बात करो वही बिजी है और कहता है “अपना ध्यान रखो। “
ध्यान खुद को ही रखना है मगर ध्यान देने वाला कोई नहीं।
अरे ! क्या अजब दौर है? यही सोचते हुए सूनी दीवारों पर अपनेपन की तलाश करने लगा।

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