
वर्षा गर्ग, प्रसिद्ध लेखिका ,मुंबई
समझाया उसे जाता है जो समझना चाहे। जो जानबूझकर आँखें बंद किए बैठा हो, उसे क्या समझाएँ?
“इतना अच्छा रिश्ता बताया है बिना बाप की बेटी, बिना दहेज कौन शादी करता है? पर तुम्हें तो उल्टी गंगा बहानी है। भला बेटी को इतना पढ़ाने से क्या मिलेगा?”
कानों में गूँजती ये आवाज़ें सुम्मी की परेशानी बढ़ा रही थीं। साथ चलती बेटी को उसने कनखियों से निहाराचेहरे पर आत्मविश्वास का तेज, सधी हुई चाल। मन गर्व से भर गया। “कहने दो, जिसे जो कहना हो। मैं अपनी बेटी के सपनों को सच करने में उसका पूरा साथ दूँगी।”
वह बिटिया को भी हमेशा समझाती रहती अगर अपने सपनों को पूरा करना है तो व्यर्थ के सवाल-जवाब में मत उलझना।
जिस दिन कुछ बन जाओगी, सभी को अपने-आप जवाब मिल जाएगा।
टीवी देखते हुए दीवान पर बैठे-बैठे ही झपकी लग गई और एक बार फिर पिछला सब आँखों के सामने से गुजर गया।
मोबाइल के नोटिफिकेशन से नींद टूटी। बेटी का मैसेज था- “अपनी डिग्री और प्रशिक्षण के दम पर राष्ट्रपति भवन में हिंदी भाषा की अनुवादक के रूप में नियुक्ति हुई है।”
“मम्मी! अगले महीने ज्वाइन करना है। आपको भी साथ चलना होगा। बहुत इच्छा है न आपकी राष्ट्रपति भवन के बगीचे को देखने की?”
अपनी तपस्या यूँ सफल होते देख खुशी से आँखें छलछला गईं। उठकर भगवान के आगे दिया जलाते हुए उसने बिटिया को ढेरों आशीष दे डालीं।
मुँह पर जबरन रखी समाज की वर्जनाओं की उँगली अपने-आप ही हट गई।