
विजयलक्ष्मी सिंह, प्रसिद्ध लेखिका
बहे शीतल बयार वन-उपवन,
कर शृंगार खिले सुंदर सुमन।
फूलों से पराग झर-झर जात,
गीत गाएँ भँवरे, तितली भी भुनभुन।
बैठी बगिया में आज, देखूँ सुंदर विहान,
कूकूँ करती कोयल की मधुर सरगम।
देख अनुपम सा दृश्य, मन होय विस्मित,
छूना चाहूँ मैं ऊँचा गगन।
बैठी टीले पे साज, मद-मस्त मगन आज,
ख़बर होती जो प्रीतम की आवन।
झोंके निंदिया के आवें, सुंदर स्वप्न दिखावें,
मंद-मंद बहती है पवन।
दिल वश में नहीं आज, उड़े नये अंदाज़,
ऐसा सुख नहीं चौदह भवन।
भँवरा, तितरा जो आए, मधुरस चख-चख जाए,
करते हुए मन में स्पंदन।
जब बहे पुरवाई, तन लेत अंगड़ाई,
कुछ और न सुहाई, दिल होत रोशन।
बस्तर अपना सँभारूँ, बेर-बेर मैं निहारूँ,
जैसे कट न जाए मेरी पतंग।
मेरे जीवन की डोर, मन करता हिलोर,
ऐसा ही सबेरा हो हरदम।
अली आए भये भोर, उठे चंदा-चकोर,
लेने अमृतरस लाए सुंदर शगुन।