शब्दों से सपनों तक का सफर
बचपन से शब्दों से जुड़ी लेखिका ने परिवार और जिम्मेदारियों के बीच अपनी रचनात्मक पहचान बनाई. ‘कुमकुम लगे पाँव’ उनके साहित्यिक सफर और स्त्री जीवन के विविध रंगों की संवेदनशील अभिव्यक्ति है.

बचपन से शब्दों से जुड़ी लेखिका ने परिवार और जिम्मेदारियों के बीच अपनी रचनात्मक पहचान बनाई. ‘कुमकुम लगे पाँव’ उनके साहित्यिक सफर और स्त्री जीवन के विविध रंगों की संवेदनशील अभिव्यक्ति है.
क्या आपने कभी बिना शराब पिए नशे का अनुभव किया है? यह थकान या कमजोरी नहीं, बल्कि ऑटो-ब्रुअरी सिंड्रोम जैसी दुर्लभ बीमारी का संकेत हो सकता है, जिसमें आपके शरीर के भीतर कुछ बैक्टीरिया खुद शराब बनाते हैं।
यह कविता एक ऐसी स्त्री की आवाज़ है जो हर जगह मौजूद होते हुए भी कहीं दर्ज नहीं थी। यह उसकी पहचान, उसकी अनसुनी चीख और उसके जीवित रहने के अधिकार की मार्मिक अभिव्यक्ति है।
उसने आवाज दी, और मैं चल पड़ी—अपनी भावनाओं की गठरी उठाए हुए। पास पहुंचने पर जाना कि उसके मन की हर गली कितनी सँकरी है, हर कोना कितना सीमित। उन सँकरी गलियों में चलते-चलते मैं खुद भी सिकुड़ गई। चारों ओर अँधेरा था, और मैं उसी अँधेरे में भटकती हुई आखिरकार उसके पास पहुँची। वह वहाँ था. खुश, बेफिक्र और अपने आप में मशगूल। न उसे मेरा इंतज़ार था, न मेरी कोई ज़रूरत। तब एहसास हुआ जहाँ ज़रूरत नहीं, वहाँ ठहरना नहीं चाहिए। मगर लौटने का रास्ता तो मैं भूल चुकी थी। अब वही सवाल मन में गूंजता है मैं क्या करूँ? इस भावनाओं की गठरी का बोझ कैसे उठाऊँ?
सब्ज़ियों की मंडी से शुरू हुई यह स्मृतियों की यात्रा रिश्तों तक पहुँचती है, जहाँ लेखक अतीत और वर्तमान की तुलना करते हुए बताता है कि जैसे सब्ज़ियाँ बासी होकर फेंक दी जाती हैं, वैसे ही आज रिश्ते भी संवेदना के अभाव में डस्टबिन तक पहुँच जाते हैं।
यह कविता आधुनिक जीवन के दिखावे और सादगी के बीच के द्वंद्व को बेहद मार्मिक तरीके से प्रस्तुत करती है। कवि यह संदेश देता है कि रिश्तों में ब्रांड्स और बाहरी आडंबर नहीं, बल्कि सच्चाई और सादगी ही सबसे महत्वपूर्ण होती है। प्रेम का असली रूप व्यक्ति के भीतर होता है, न कि उसके पहनावे या स्टेटस में।
नई उम्र में ही रंजू की दुनिया जैसे अचानक रंगहीन हो गई थी। जिस आईने के सामने वह कभी सजती-संवरती थी, अब उसी आईने में उसे अपना चेहरा भी अजनबी सा लगता था। बारहवें के दिन जब ननद उसके लिए श्रृंगार का सामान लेकर आई, तो उसके भीतर दबा हुआ सारा दर्द आँसुओं में बह निकला“अब इन सबका क्या करूँ दीदी?”
जीवन एक संघर्ष है” में जीवन की कठिनाइयों और चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों के बीच संघर्ष की अनिवार्यता को व्यक्त किया गया है। लेखक बताते हैं कि केवल साँस लेना जीवन नहीं है; जीवन का सार संघर्ष, जिजीविषा और प्रकृति के साथ सामंजस्य में है। प्रेम, सौंदर्य, आनंद, विरह और मिलन—सबका संतुलन संघर्ष के माध्यम से ही मिलता है। यह कविता यह संदेश देती है कि अतीत, वर्तमान और भविष्य—सभी में संघर्ष ही जीवन की असली कहानी है। जीत और हार से परे, संघर्ष ही हमें सशक्त बनाता है और जीवन को सार्थक बनाता है।
मधु झुनझुनवाला ‘अमृता‘ प्रसिद्ध साहित्यकार, जयपुर (राजस्थान) मुंतज़िर थे हमीं न कल होंगे ।ये लम्हे क्या कभी अज़ल होंगे । फ़िक्र अब है कहाँ मुहब्बत में,ज़ीस्त में क्यों सनम दख़ल होंगे । दिल बुझेंगे कभी जो फुर्कत में,ख़्वाहिशों के न फिर महल होंगे । बाद मेरे इन्हीं निगाहों में ,अश्क़ में तर हसीं कँवल होंगे…