यह रचना संवाद की इच्छा के माध्यम से जीवन के विभिन्न पहलुओं, मानवीय भावनाओं और सामाजिक विडंबनाओं को उजागर करती है। कवयित्री अपने मन की गहराइयों से उन क्षणों और पात्रों से बात करना चाहती है जो प्रकाश और अंधकार, प्रेम और वियोग, सम्मान और अपमान, मर्यादा और अन्याय, त्याग और पीड़ा के प्रतीक हैं। वह आकाश के अंधकार, स्वाति नक्षत्र की बूंद, सुगंधित पुष्प, शहीद की मां, परंपराओं से पीड़ित नारी, दहेज से आहत पिता, बिछड़े प्रेमी, व्यथित पुरुष, राम की मर्यादा, बुद्ध के धर्म ज्ञान और अश्रु की स्थिर बूंद तक—हर उस संवेदनशील अनुभव से जुड़ना चाहती हैं जो मनुष्य के भीतर गहराई से स्पंदित होता है। यह संवाद आत्मा की पुकार है, जो जानती है कि शब्द शायद परिभाषित न कर पाएं, लेकिन मौन में भी हृदय की पीड़ा सजीव हो उठती है।