भरत जैन देश का सबसे अमीर भिखारी

मुंबई की सड़कों पर बैठने वाला एक साधारण सा भिखारी, जिसकी रोज की आमदनी ने उसे ७.५ करोड़ रुपये की संपत्ति का मालिक बना दिया. भारत जैन की कहानी सिर्फ चौंकाती नहीं, बल्कि शहरी भारत की अनकही सच्चाइयों का आईना भी दिखाती है. जहां समझदारी, बचत और धैर्य फुटपाथ से लेकर करोड़ों की संपत्ति तक का सफर तय कर देते हैं.

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सागर और मन

सागर और मन का रिश्ता गहरा है। जब चाँद की छाँव में ऊँची तरंगें उठती हैं, तो उनका झिलमिलाना किसी स्वप्न जैसा प्रतीत होता है। लहरें आकाश को छूने की चाह में उमड़ती हैं, लेकिन अंततः अपने ठिकाने पर लौटकर शांत हो जाती हैं।

सागर ने समय के प्रवाह से यही सीखा है—हर क्षण, हर रंग बदलता रहता है। कभी वह मचलता है, तो कभी थमकर भीतर के बुझते-सुलगते अलाव को सँजोए रहता है। चाँदनी की चादर में ढकी लहरें रात की खामोशी में खो जाती हैं। वे कभी सौम्य स्वर बनती हैं, तो कभी प्रबल गूँज की तरह उभरती हैं।

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संवाद

यह रचना संवाद की इच्छा के माध्यम से जीवन के विभिन्न पहलुओं, मानवीय भावनाओं और सामाजिक विडंबनाओं को उजागर करती है। कवयित्री अपने मन की गहराइयों से उन क्षणों और पात्रों से बात करना चाहती है जो प्रकाश और अंधकार, प्रेम और वियोग, सम्मान और अपमान, मर्यादा और अन्याय, त्याग और पीड़ा के प्रतीक हैं। वह आकाश के अंधकार, स्वाति नक्षत्र की बूंद, सुगंधित पुष्प, शहीद की मां, परंपराओं से पीड़ित नारी, दहेज से आहत पिता, बिछड़े प्रेमी, व्यथित पुरुष, राम की मर्यादा, बुद्ध के धर्म ज्ञान और अश्रु की स्थिर बूंद तक—हर उस संवेदनशील अनुभव से जुड़ना चाहती हैं जो मनुष्य के भीतर गहराई से स्पंदित होता है। यह संवाद आत्मा की पुकार है, जो जानती है कि शब्द शायद परिभाषित न कर पाएं, लेकिन मौन में भी हृदय की पीड़ा सजीव हो उठती है।

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दयानंद महाविद्यालय में हिंदी उत्सव

19 सितंबर 2025 को दयानंद कला महाविद्यालय, लातूर में हिंदी दिवस बड़े उत्साह और गरिमा के साथ मनाया गया। इस अवसर पर हिंदी विभाग ने “नवचेतना” हिंदी साहित्य मंडल की स्थापना की, जो विद्यार्थियों को रचनात्मक अभिव्यक्ति का मंच देगा। कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्वलन और महर्षि दयानंद सरस्वती की प्रतिमा वंदना से हुआ। मुख्य अतिथि श्री बजरंग पारिख ने हिंदी भाषा की महत्ता और वर्तमान समाज में इसकी प्रासंगिकता पर विस्तार से चर्चा की। प्रधानाचार्य डॉ. शिवाजी गायकवाड़ ने कहा कि हिंदी केवल संवाद की भाषा नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति और आत्मा की अभिव्यक्ति है। छात्रों ने भावनात्मक और प्रेरणात्मक कविताएँ प्रस्तुत कीं और हिंदी के प्रति अपने कर्तव्यों का संकल्प लिया।

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मिट्टी बनती औरत

स्वेटर और मफलर बुनने वाली औरत जब अपनी पहचान बुनने लगती है, तो उसका आकाश सिरे से उघड़ने लगता है। उसके भीतर के सपने जैसे भाप बनकर उड़ जाते हैं, शापित सितारों को सीने से लगाए वह औरत जीवन की फसल बुनती है। बारिश और बादलों का इंतजार करती वह, अंततः खुद ही आसमान का अंचल बन जाती है — तार-तार, मटमैला, लेकिन जीवनदायी। उसका पसीना नदी बन बहता है और सितारे तृप्त हो हरी दूब में छुपा-छुपी खेलते हैं।

रात बीतने के बाद उसकी थकी आँखें शून्य में कुछ टटोलती हैं, निःशब्द समंदर बनती औरत दुःस्वप्न से जागती है — अपने बच्चों के सितारों के डूबने का भय लिए। लेकिन वह हार नहीं मानती, अपने बच्चों के चेहरों को चूमते हुए उनके लिए सपनों का आसमान बुनती है। खुद की पहचान की ज़मीन तलाशती वह औरत, धीरे-धीरे मिट्टी बनती जाती है — ज़रूरत की मिट्टी, जीवन की मिट्टी।

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दूसरों पर टिकी खुशी, भीतर से टूटता मन

जब खुशियाँ दूसरों पर निर्भर हो जाती हैं, तब टूटना तय होता है। यह लेख बाहरी और आंतरिक खुशी के फर्क को समझाते हुए आत्मनिर्भर, स्थिर और सच्ची खुशी की ओर ले जाने वाला भावनात्मक आत्मचिंतन है।

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बप्पा की डायरी

ग्यारह दिनों तक मेरे भक्त मेरे दर्शन को तरसते रहे और मैं उनके प्रेम से अभिभूत था। परंतु विसर्जन के दिन जब बारह घंटों तक जल में खड़ा रहा, तब मैंने सच्चाई देखी।
मंडपों में लोग धक्का-मुक्की कर रहे थे, बहसबाजी कर रहे थे, आगे बढ़ने के लिए एक-दूसरे को गिरा रहे थे। सेवक भी अपना रोब दिखा रहे थे।
मैंने सोचा—पंडाल में नहीं तो क्यों न खुले आसमान और समुद्र की लहरों के बीच सबको समान रूप से दर्शन दूँ। वहाँ न कोई कतार, न कोई वीआईपी, न कोई भेदभाव। लेकिन… मेरे भक्तों ने वहीं भी मुझे याद दिला दिया कि इंसान ने भगवान को भी अपने बनाए हुए अमीर-गरीब और ऊँच-नीच के नियमों में बाँध दिया है।

मैं तो वही एकदंत गजानन हूँ—चाहे लालबाग में विराजमान रहूँ या किसी छोटे पंडाल में, या फिर गिरगांव चौपाटी की लहरों में।मेरे लिए सिर्फ एक ही चीज़ महत्वपूर्ण है—मन से की गई भक्ति। बाकी सब इंसानी दिखावा है।”**

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महाकाल की भक्ति और सेवा: कावड़ यात्रियों के लिए अन्नक्षेत्र

श्रावण मास में उज्जैन आने वाले कावड़ यात्रियों के लिए श्री महाकालेश्वर मंदिर समिति ने इंदौर रोड स्थित त्रिवेणी शनि मंदिर के पास अस्थायी अन्नक्षेत्र की शुरुआत की है, जहाँ प्रतिदिन नि:शुल्क भोजन वितरित किया जा रहा है। यह भोजन महाकाल मंदिर के अन्नक्षेत्र में तैयार होकर भगवान को भोग लगाने के बाद यात्रियों तक पहुँचाया जाता है। समिति द्वारा सोमवार को व्रती भक्तों के लिए फलाहारी खिचड़ी और चिप्स की भी विशेष व्यवस्था की गई है। वर्ष 2004 से यह अन्नक्षेत्र परंपरा रूप से संचालित हो रहा है, जो भक्तों के दान से चलती है। विशेष अवसरों पर श्रद्धालु भोजन प्रसादी के लिए मंदिर को दान भी करते हैं। पहले सोमवार को 10 हजार से अधिक श्रद्धालुओं ने अन्नक्षेत्र का लाभ उठाया।

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रोशनी के दोहे

दीपों के इस पर्व में घर-घर उजाला फैलता है और खुशियाँ अपार होती हैं। सज-धज कर बाजारों में रौनक है, फूल और मिठाइयाँ बिक रही हैं। हर मन में राम की ज्योति बसती है और प्रीति व उजाला हर ओर दिखाई देता है। अहंकार और वहम को छोड़कर प्रभु का नाम जपने से, अच्छे कर्मों के माध्यम से सुख और शांति प्राप्त होती है।

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साहित्यिक सम्मान की यात्रा

बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन, पटना में चतुर्वेदी प्रतिभा मिश्र साहित्य सम्मान प्राप्त करना मेरे लिए केवल एक उपलब्धि नहीं, बल्कि रांची से पटना तक की वह भावनात्मक यात्रा थी जिसमें परिवार, गाँव, मायका और साहित्यिक रिश्तों का आत्मीय संगम साकार हुआ। यह सम्मान वर्ष 2025 के अंत में जीवन को कृतज्ञता और आनंद से भर देने वाला क्षण बन गया।

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