नई शुरुआत

यह कविता हमें याद दिलाती है कि पराजय को भूलकर स्वयं पर विश्वास करना और पुनः शुरुआत करना आवश्यक है। आने वाला कल बेहतर होगा, और प्रसन्नता, धैर्य, हौसला और सतत प्रयास हमें निराशा से आगे बढ़ने में मदद करेंगे। अपने लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित करके, अच्छे कर्म करते हुए हम सफलता और खुशियों की राह प्रशस्त कर सकते हैं।

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वेरी गुड..

मानसिंह शरद, प्रसिद्ध व्यंग्यकार, उज्जैन “रामस्वरूप जी, आपने आज जो हिंदी दिवस पर शानदार कार्यक्रम आयोजित किया, मन प्रसन्न हो गया। हिंदी के उत्थान के लिए आपका कार्य वंदनीय है।” “ऐसा कुछ नहीं, मित्र प्रमोद। मैं तो हिंदी का छोटा सा सेवक हूँ। कार्यक्रम के पीछे मेरा यही उद्देश्य होता है कि हिंदी में साहित्य…

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क्या हिंदी सनातन का आधार है?

हिंदी केवल एक भाषा नहीं, बल्कि सनातन संस्कृति की जीवंत धारा का सेतु है। संस्कृत जहाँ गूढ़ ज्ञान की वाहक है, वहीं हिंदी उसे सरल बनाकर लोकजीवन तक पहुँचाती है। संत तुलसीदास, सूरदास, कबीर और मीरा ने हिंदी को संस्कृति और भक्ति का सशक्त वाहक बनाया। महात्मा गांधी ने इसे “जन की भाषा” कहा। हिंदी संवाद का माध्यम होने के साथ-साथ स्वतंत्रता, आत्मगौरव और राष्ट्र चेतना की वाणी भी रही। यह भाषा वेदों की ऊँचाई और गाँव की मिट्टी की महक दोनों लिए हुए है, और हमें इसे प्रतिदिन बोलने, पढ़ने और लिखने से ही जीवित रखना चाहिए।

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हिंदी हमारी भाषा

हिंदी हमारी मातृभाषा है, सहज अभिव्यक्ति और समृद्ध शब्दों वाली, जिसका आधार संस्कृत में है। यह भाषा भारतीयों के लिए भाव, सौंदर्य और संस्कृति का प्रतीक है। हिंदी हमें अनुभूतियों, छंद, अलंकार और दोहों के माध्यम से जोड़ती है। यह माँ के आँचल जैसी शीतलता देती है, और जनमानस में गंगा की तरह पावन तरंगें फैलाती है। हिंदी साहित्य का उपवन हमेशा सुवासित और पल्लवित रहे, यही हमारी कामना है।

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दिल की भाषा

हिन्दी केवल एक भाषा नहीं, बल्कि दिल और दिमाग का मिलन, आपसी तालमेल और संस्कृति का प्रतीक है। यह राष्ट्रीय भाषा न होकर भी हर व्यक्ति के भीतर निकलने वाली आवाज़ है, मौखिक और लिखित संचार का जरिया है। नए ज़माने के साथ इसे भूलना नहीं चाहिए, क्योंकि यह धरोहर है जिसे संभाल कर रखना आवश्यक है।

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मैं हूं सूखी लकड़ी..

मैं सूखी लकड़ी हूं, जीवन में हितकारी और हर रूप में कल्याण फैलाने वाली। मैं शिव के मस्तक पर सजती हूं, कृष्ण की बांसुरी की तान में झूलती हूं, घरों में झूले और पलनों का आधार बनती हूं, और रोगियों का उपचार भी करती हूं। हर कदम पर मेरी उपस्थिति है—सृष्टि, श्रद्धा और जीवन के हर पहलू में। यही मेरी शक्ति और पहचान है।

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अरमान

नदी के किनारे खड़े होकर वह लंबे समय तक मटमैले पानी को निहारता रहा। हफ्तों से पानी देखने की आस थी, पर आज जब पानी सामने था तो वह विनाश का दूत बन आया था। अरमान तो बहुत थे—खेत लहलहाने के, फसल कटने की, जीवन संवरने की—पर अब सब कुछ बह चुका था। उसने भारी मन से कहा, “बहुत अरमान थे तुझे… देख ले पानी… जी भर के…”

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ईश्वर को देखा

ईश्वर को किसी ने प्रत्यक्ष नहीं देखा, पर वह हर ओर विद्यमान है। साँसों की लय, धड़कनों की गति, सूरज की रोशनी, चाँद की चाँदनी, फूलों की मुस्कान और नदी की रागिनी—सब उसी विराट ऊर्जा के रूप हैं। हम सभी उसी अनंत चेतना के कण हैं, जो समय के साथ बहते रहते हैं। मोक्ष कोई शून्य नहीं, बल्कि जीवन का सार है, जो सृष्टि से तादात्म्य स्थापित करने पर मिलता है। जब हृदय में करुणा, प्रेम और संवेदना खिलते हैं, तभी ईश्वर का सच्चा अनुभव होता है।

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हिन्दी से है पहचान

सुमन दीक्षित, प्रसिद्ध लेखिका, कोलकाता अभिव्यक्ति किसी भी जीव की,ख़ासकर मानवीय संवेदनाओं का,सशक्त माध्यम परिलक्षित होती है—वह हो चाहे किसी भी रूप में…! अगर भाषा की बात आती,तो सम्मान हर भाषा का है;पर हिन्दी तो मेरे लिए जैसेईश्वर का एक वरदान है…! हिन्दी से है पहचान, क्षमता,गौरव भरा होता सदा सृजन।हिन्दी से जुड़ी है आत्मा…

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hindi divas

हिंदी दिवस: मातृभाषा की मौन पीड़ा

हिंदी मेरी कविता के भाल की बिंदी है, जिसने हर प्रसंग में मेरा साथ निभाया और सहज-सरल भाषा से मेरे गीतों को ढाल दिया। लेकिन यह पीड़ा भी साथ है कि अंग्रेज़ों से मिली आज़ादी के बाद भी हम अंग्रेज़ी के ग़ुलाम बने बैठे हैं। मातृभाषा की दुर्दशा देखकर दिल रो उठता है। हिंदी मस्तक की अट्टालिका से औंधे मुँह गिरती दिखाई देती है और अंतर्मन चीत्कार कर उठता है कि जिस देश को अथाह परिश्रम से आज़ादी मिली, वहाँ हिंदी का तिरस्कार क्यों? यह कैसी विडंबना और कैसी बर्बादी है!

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