
शिखा खुराना कुमुदिनी, प्रसिद्ध लेखिका, नई दिल्ली
सबको ज्ञात रहता है सदा ही, कि खाली हाथ ही जाना है।
जीवन भर मेरी मेरी रटते रटते मर जाना है।
देख रहे हैं रोज़ यहां तिनका तिनका बिखरते हुए।
भागते चले जा रहे हैं दिखते नहीं कहीं रुकते हुए।
सब तिजोरियां भरी हुई हैं, जीवन के आनंद से।
समय नहीं हाल पूछे कोई, पतझड़ का बसंत से।
कमा रहे हैं बेइंतहा दौलतें, हो रहे हैं दौलतमंद।
समझ की खिड़की को फिर भी करके बैठे हैं वो बंद।
घड़ी घड़ी समय देखते, घड़ी भर का भी अब समय नहीं है।
कब दिन ढले और शाम हो जाए, ये भी तो तय नहीं है।
शोर मचाते हैं कि मिलती नहीं कहीं सुकून की राह।
दिख जाए गर सुकून राह में, तो रहती नहीं फिर उसकी चाह।
बदल रहे हैं मापन जीवन के, बदल रहे हैं पल पल पैमाने।
अपने लिए जीते हों जहां सब, किसको वहां कोई अपना जाने।
सबकी अपनी डफ़ली, सबका अपना राग हुआ है।
हर कोई जीने से ज्यादा मरने को बेताब हुआ है।
हार्दिक धन्यवाद
Bahut khubsurat