लिखते हुए तुम

सुरभि ताम्रकार, लेखिका, दुर्ग

मेरी ख़्वाबों की फ़ेहरिस्त में
अब और भी ख़्वाब हैं।

तुम्हें लिखते हुए
अपलक देखना है मुझे
देखना है बदलते रेखाचित्र,
चेहरे के हाव-भाव।

वो उँगलियों की चलती रूहानी चहक,
जो तुम्हें दुनिया से दूर कर देती है।
देखना है
वो काग़ज़, जो तुम्हें लिबास पहनाते हैं,
वो प्यारी क़लम, जो सखी-सी बोलती है।

वो थामे हुए आँसू देखना है,
जो अब कोहरा हो रहे हैं।
वो भाव देखने हैं,
जिनमें तुम डूबकर
तैर कर लौट आते हो।

इन एहसासों को
कब तुम मेरे हिस्से करोगे?
क्या तुम यह बात समझ पाओगे?

तुम्हें लिखने के लिए,
मुझे तुमको लिखते हुए देखना
पहली बार क़लम पकड़कर
फिर से लिखना सीखने जैसा है।

3 thoughts on “लिखते हुए तुम

  1. सीखते रहना यही जीवन है बहोत सुंदर चित्रण 👌👍👌👍👌👍

  2. सीखते रहना ही जिंदगी है,शानदार रचना

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