प्रेम, परिक्रमा और प्रसाद : जंगल में प्रभु की लीला

A lone Indian devotee performing dandavat parikrama on a forest path under full moonlight near Giriraj Hill, surrounded by calm nature, reflecting devotion, surrender, divine protection, and spiritual peace.

दर्पण सोनी, ट्रेवलर, महिदपुर रोड (उज्जैन)

प्रभु कृपा से आज की सुबह एक नए अनुभव के साथ आरंभ होती है. सुनील भाई, जो मेरे साथ थे, अब विदा लेना चाहते हैं. यद्यपि मेरा मन उन्हें रोकने का होता है, परंतु उनकी पारिवारिक जिम्मेदारियां और मेरे घर की चिंता को ध्यान में रखते हुए, उन्हें दानघाटी तक छोड़कर विदा करता हूं.
ई-रिक्शा से पुनः अपने दंडवती स्थान पर पहुंचकर परिक्रमा प्रारंभ करता हूं. सूरज अपनी सम्पूर्ण ऊष्मा के साथ दया की परीक्षा ले रहा है, पर गिरिराज जी के दर्शन और उनकी उपस्थिति में यह धूप भी आनंददायक प्रतीत होती है.

कुछ ही समय बाद मेरी दृष्टि एक सज्जन पर पड़ती है, जो मुझसे आगे हैं, अकेले हैं, बैग अपने कंधे पर उठाए हैं और दूसरी ओर से दंडवत कर रहे हैं. मन में इच्छा होती है कि इनसे मिलूं. प्रभु की लीला देखिए, कुछ दूरी पर जाकर वे रुकते हैं और मैं पीछे से पहुंच जाता हूं.
विनम्र बातचीत में ज्ञात होता है कि वे दिल्ली से हैं, लगभग साठ वर्ष के हैं, अकेले हैं, और किसी विशेष स्थान पर ठहरने की व्यवस्था भी नहीं है. उनका सरल जीवन कभी खुले आकाश के नीचे, कभी ब्रज की धूल में मुझे भीतर तक स्पर्श करता है. मेरा जो अहंकार था कि मैं अकेले दंडवती कर रहा हूं, वह गिरिराज जी ने क्षण भर में हर लिया.
ऐसे ही तीन एकाकी यात्रियों से इस परिक्रमा में भेंट हुई है, जो मुझसे कहीं अधिक ईश्वर की निकटता अनुभव कर रहे थे. उनसे मिलकर मेरी निष्ठा और प्रभु प्रेम में वृद्धि हुई.
थोड़ा आगे बढ़ते हुए मुझे अचानक प्रतीत होता है कि पेट गड़बड़ाने वाला है. खंभा संख्या 140 पर दंडवत को विश्राम देता हूं और दानघाटी स्थित एक आयुर्वेदिक चिकित्सालय पहुंचता हूं. वहां एक वैद्यजी तीन पुड़िया देते हैं एक अभी, एक हल्के भोजन के बाद, और एक उसके एक घंटे बाद.
राधा कृष्ण पैलेस लौटकर स्नान व भोजन करता हूं, औषधि लेता हूं. आश्चर्यजनक रूप से तीन घंटे में पूर्ण स्वस्थ अनुभव करता हूं. यह भी प्रभु की कृपा ही थी.
शाम तक पूंछरी के लोटे के आसपास पहुंचता हूं. तभी पंडित मुरारी जी का फोन आता है. मैं उन्हें अपनी स्थिति बताता हूं. उन्होंने पहले ही कहा था कि मुझे जंगल के मार्ग से परिक्रमा करनी चाहिए, जिससे गिरिराज जी का सान्निध्य और अधिक मिल सके और ब्रजरज से शरीर पावन होता रहे. वे स्वयं आकर मुझे मार्ग दिखाते हैं और कहते हैं कि रात 8 बजे के बाद दंडवत न करना.


रात्रि की पूर्णिमा है, चंद्रमा का मधुर प्रकाश गिरिराज जी की छाया को और अधिक दिव्य बना रहा है. एक अलौकिक शांति और अकेलापन जिसमें अकेलापन नहीं, गिरिराज जी का हाथ थामे चलना है.
लगभग रात 9 बजे कुछ यात्रियों का समूह मुझे पार करता है. उनमें से एक युवती रुकती है और मधुर स्वर में पूछती है, बाबा, आप अकेले दंडवती कर रहे हो?
मैं मुस्कराकर कहता हूं, नहीं, गिरिराज जी के साथ.
वह हर्षित होकर कहती है, अरे वाह! फिर तो आप बहुत धन्य हैं.
वह पूछती है, आपने कुछ पाया?
मैं सच कहता हूं, आज पेट खराब था, कुछ नहीं पाया.ङ्घङ्घ
उसका उत्तर सरल, पर गूढ़ था हमारे पास भोजन है, कुछ सेवा ले लीजिए बाबा.
मैं संकोच करता हूं, पर उसके प्रेमपूर्ण आग्रह के आगे झुक जाता हूं.
पूछने पर वह बताती है कि आलू की सब्जी और पूरी है. मैं मना करता हूं, परंतु फिर वह कहती है कि अमनिया (बिना झूठी) रोटी भी है. मैं सहमति देता हूं.
वे मुझे प्रेमपूर्वक रोटी और सब्जी परोसते हैं. जब दो रोटियां दी जाती हैं और मैं कहता हूं, मैंने तो एक ही मांगी थी,फफ तो वह लड़की कहती है, एक आपकी और एक गिरिराज जी की.
उस क्षण मेरा हृदय छलक उठता है हाथों में महाप्रसाद, आंखों में प्रेमाश्रु. आज भी यह लिखते हुए आंखें सजल हो जाती हैं.
भोजन के पश्चात पानी की बोतल वापस करता हूं और अनुभव करता हूं कि यह भोजन राधारानी ने ही भेजा था. वह स्वाद, वह वात्सल्य, वह अनुभूति वाणी से परे है.
कुछ दूर चलने पर प्यास लगती है, पर प्याऊ की मटकी खाली है. अंदर जाकर देखता हूं भूमि में टैंक है, जिसमें रस्सी और बाल्टी रखी है. पानी पीकर मन पुलकित हो उठता है प्रभु जंगल में भी मेरी चिंता कर रहे हैं.
दंडवत करते-करते इंद्रमानमर्दन स्थल आता है. वहीं एक श्वान (कुत्ता) आकर मेरे शीट पर बैठ जाता है. मैं हटाता हूं, वह फिर बैठ जाता है. यह क्रम लगभग डेढ़ किलोमीटर तक चलता है. संभवतः गिरिराज जी किसी रूप में मेरी रक्षा कर रहे थे.
रास्ते में नीलगायों का समूह दिखता है, कहीं रामचरितमानस की चौपाइयों की ध्वनि, कहीं बंदरों की उछल-कूद यह वन एक अलौकिक संगीत बन गया है.
कहीं भय नहीं, केवल विश्वास और आनंद. चंद्रमा की शीतल छाया में, गिरिराज जी की कृपा में डूबता हुआ, मैं रात्रि लगभग 1 बजे जतिपुरा मुखारविंद पहुंचता हूं. वहीं दंडवती को विश्राम देता हूं.
प्रभु की लीला अपार है जंगलों में भी सुरक्षा, जल, अन्न और संगति की सुंदर व्यवस्था. मुझे कुछ नहीं करना पड़ता, केवल समर्पण चाहिए.

One thought on “प्रेम, परिक्रमा और प्रसाद : जंगल में प्रभु की लीला

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *