इजाज़त दो… बस पास रहने की
मैं सोचती हूं कि क्यों इन दिनों हर पल तुम्हारा ही ख़याल आता है। दिल करता है कि कुछ ऐसा बन जाऊं जिससे तुम्हारे आस-पास रह सकूं हमेशा — कभी वो कागज़ जिस पर तुम दिल की बातें लिखते हो, कभी तुम्हारी कलम, तुम्हारी ऐनक, या बस कोई ख़याल जिसमें तुम डूबे रहते हो। लेकिन सबसे ज़्यादा दिल चाहता है कि मैं वो अश्क बन जाऊं — जो तुम्हारी आंखों में ठहरा होता है, जिसे तुम दुनिया से छुपाकर रखते हो, गिरने नहीं देते किसी के सामने। वही अश्क, जो तुम्हारे सबसे पास होता है और फिर भी नज़र नहीं आता। ख़्वाहिश बस इतनी है… कहो, क्या इजाज़त है?