माँ के दो हाथों की टोकरी

माँ के दो हाथों की टोकरी में ज़िंदगी सिमटी रहती है। कुछ आड़ी-तिरछी रेखाएँ हैं, बिल्कुल सटीक नहीं, लेकिन उनमें वही अपनापन है जैसे माँ की हथेलियाँ। वह टोकरी, जिसमें माँ एक जीवन को सम्भालकर रखती है, उसे पालती-पोसती है, दुलारती है। समय बीत गया, दुनिया बदली, मैं भी बहुत बदल गई, पर तेरे भीतर अब भी वही मासूमियत है—वही छोटे-से बच्चे की छवि, जो छोटी-छोटी गलतियाँ दोहराता है और माँ की हथेली पर सुरक्षित रहता है। लेकिन इस जंगल जैसी दुनिया में तुझे कैसे रखूँ? यही सोचकर दिल कांप जाता है। आ जा फिर मेरी हथेली में, छुप जा आंचल में, चैन से सो जा। इस भागदौड़ और छल-कपट को भूल जा, क्योंकि यह जीवन-जंगल कोई खेल नहीं। इसका अंत केवल एक “जंगल-आग” है।

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विज्ञान और आस्था का संगम है टैरो

आज की तेज़-तर्रार ज़िंदगी में जब लोग करियर, रिश्तों और आर्थिक अस्थिरता को लेकर परेशान रहते हैं, तब कुछ लोग वैदिक विद्या और रहस्यमयी विज्ञान की ओर मुड़ते हैं. इन्हीं विद्या में टैरो कार्ड रीडिंग, अंक ज्योतिष और वास्तु शास्त्र शामिल हैं. इन विषयों पर गहरी पकड़ रखने वाली एक जानी-मानी विशेषज्ञ गोरखपुर की पूनम शर्मा से विशेष बातचीत के प्रमुख अंश-

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तेरी बिंदी

आज तुम्हारे भाल पर बिंदी बीचों-बीच सजनी चाहिए थी, पर तुमने उसे किनारे सरका दिया। यह कैसी गुस्ताख़ी? बस उसी को ठीक करने आया हूँ।”
उसने नंदिनी की बिंदी को मध्य में सजाया, और उसी क्षण उनकी साँसें थम-सी गईं।
रात को नंदिनी ने वही बिंदी आईने पर चिपकाते हुए धीमे से कहा—“अब यहाँ विराजिए निखिल जी… र हाँ, आँखें बंद रखना।”अगले दिन जब उसने निखिल का स्केच देखा, उस पर लिखा था—
“एक संपूर्ण रमणी नंदिनी।”

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कन्हैया

मैं कन्हैया को ढूँढ रही हूँ। घर, बाहर, देहरी, हर द्वार पर तलाश करती हूँ, पर न जाने किन कुंज-गलियों में वह छिपा हुआ है, मानो आज फिर मटकी फोड़ने आया हो।वह तनिक भी पास नहीं आता। छलिया रोज़ कोई न कोई छल करके निकल जाता है। मैं मथ-मथकर माखन तैयार करती हूँ, पर पता नहीं वह इसे कैसे भोग लगाता है।वह चोर की तरह घर के भीतर आ जाता है, हंडिया से माखन ले जाता है। मैं सोचती हूँ कि उसे कैसे पकड़ूँ, लेकिन वह तो क्षण भर में अदृश्य हो जाता है। अब तो कोई उपाय बताओ। उस माखन चोर को ढूँढकर लाओ। नंद बाबा से जाकर कोई कहो, ताकि मेरे इस व्याकुल हृदय को चैन मिल सके।

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बगुलाभगत

तुमने मित्रता का हाथ बढ़ाया और मैंने उसे सच्चे मन से स्वीकार भी किया। यह अनुभव मुझे एक नई ख दे गया – कि हर नए मित्र को परखकर ही अपनाना चाहिए। तुम्हें यह भ्रम रहा कि तुम्हारी मित्रता मुझे जीवन भर अभिमान देगी, लेकिन धीरे-धीरे मैं समझने लगी कि मित्रता में स्वार्थ छिपा होता है और उसका सत्य अक्सर कटु होता है।
तुम्हारी खट्टी-मीठी बातें, दिखावे की आवभगत और गरिमामयी उपस्थिति मुझे किसी बगुला भगत से कम नहीं लगी। मेरी बेरंग जिंदगी में रंग भरने की तुम्हारी कोशिश झूठी थी, और प्रेम प्रसंगों की ठिठोली मेरी आस्था को भीतर ही भीतर जला रही थी। तुम्हारी झूठी तारीफें, बनावटी शानोशौकत और ऊँची-ऊँची बातें मेरी अस्मिता पर आघात कर रही थीं। मेरे कंधे तुम्हारे सपनों का बोझ ढोते रहे, और तुम्हारी प्रसिद्धि की लालसा मेरी आहुति को प्रश्नांकित करती रही। तब मैंने जाना कि तुम्हारी मित्रता सच में कफन जैसी सफेद और मौत जैसी ठंडी है।

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साहित्य कला चौपाल द्वारा सम्मान समारोह संपन्न

पुराना कोर्ट परिसर में 15 अगस्त 2025 को सायं 4:30 बजे से स्वतंत्रता दिवस के पावन अवसर पर काव्य मंच साहित्य कला चौपाल के बैनर तले एक गरिमामय सम्मान समारोह सह काव्य गोष्ठी का सफल आयोजन किया गया. इस कार्यक्रम का संयोजन मंच की संस्थापक-अध्यक्ष अनीता सिंह, महासचिव कृष्णा दीदी एवं सचिव निवेदिता श्रीवास्तव गार्गी के नेतृत्व में हुआ. कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण विद्या वाचस्पति सम्मान के अंतर्गत साहित्यकारों का सम्मान रहा. हरिद्वार में प्राप्त इस प्रतिष्ठित सम्मान की निरंतरता स्वरूप तीन वरिष्ठ साहित्यकारों सविता सिंह मीरा, निवेदिता श्रीवास्तव गार्गी एवं अरविंद तिवारी को विशेष रूप से सम्मानित किया गया.

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तिरंगा – हमारा मान

भारत में “तिरंगा” शब्द भारतीय राष्ट्रीय ध्वज को संदर्भित करता है। हर स्वतंत्र राष्ट्र का अपना ध्वज होता है, जो उसकी स्वतंत्रता का प्रतीक है। भारत के राष्ट्रीय ध्वज को उसके वर्तमान स्वरूप में 15 अगस्त 1947 को अंग्रेजों से भारत की स्वतंत्रता से कुछ दिन पहले, 22 जुलाई 1947 को आयोजित संविधान सभा की बैठक के दौरान अपनाया गया था। यह 15 अगस्त 1947 से 26 जनवरी 1950 तक भारत के राष्ट्रीय ध्वज के रूप में और उसके बाद भारत गणराज्य के राष्ट्रीय ध्वज के रूप में कार्य करता रहा।

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“अगर ‘ना’ कह देती तो मैं गुलज़ार होता”

दुनिया कहती है कि हर एक सफल पुरुष के पीछे एक स्त्री होती है!
लेकिन भैया लोग, मैं तो स्पष्टवादी हूँ, कहीं-न-कहीं से हरीशचंद्र जी की फैमिली से जुड़ा हूँ, इसलिए साफ-साफ कहता हूँ कि मेरी असफलता के पीछे मेरी बीवी का ही हाथ है!अब देखिए न, यदाकदा मेरे फेसबुक मित्र मिलते रहते हैं—कभी बाज़ार में, कभी मॉल में, कभी रास्तों पर तो कभी गार्डन में। अक्सर लोग यही कहते हैं—”अनुपम जी, आप अच्छा लिखते हैं, मज़ा आ जाता है, आप अपने लेखों को संकलित करके छपवाइए न।”

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क्या है मानव जीवन?

मानव जीवन एक रहस्यमय विरोधाभास है —
जहाँ देवताओं का श्राप और असुरों का वरदान साथ चलते हैं।नदी बहती है, पर नाव उलटी धारा में संघर्ष करती है।पर्वत-सा हौसला और झरनों-सी भावना साथ जन्म लेते हैं,पर बादलों-सी वेदना और लहरों-सी कामना भी पीछे-पीछे आती हैं।यह यात्रा पगडंडी से शिखर तक,मकड़ियों-से भटकाव से लेकरभस्म में बदल जाने तक जाती है —और फिर भी, मुक्ति के द्वार बंद रहते हैं,अनंत खोज में भटकती आत्मा के लिए।

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संवाद

यह रचना संवाद की इच्छा के माध्यम से जीवन के विभिन्न पहलुओं, मानवीय भावनाओं और सामाजिक विडंबनाओं को उजागर करती है। कवयित्री अपने मन की गहराइयों से उन क्षणों और पात्रों से बात करना चाहती है जो प्रकाश और अंधकार, प्रेम और वियोग, सम्मान और अपमान, मर्यादा और अन्याय, त्याग और पीड़ा के प्रतीक हैं। वह आकाश के अंधकार, स्वाति नक्षत्र की बूंद, सुगंधित पुष्प, शहीद की मां, परंपराओं से पीड़ित नारी, दहेज से आहत पिता, बिछड़े प्रेमी, व्यथित पुरुष, राम की मर्यादा, बुद्ध के धर्म ज्ञान और अश्रु की स्थिर बूंद तक—हर उस संवेदनशील अनुभव से जुड़ना चाहती हैं जो मनुष्य के भीतर गहराई से स्पंदित होता है। यह संवाद आत्मा की पुकार है, जो जानती है कि शब्द शायद परिभाषित न कर पाएं, लेकिन मौन में भी हृदय की पीड़ा सजीव हो उठती है।

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