सूरीनाम हिन्दी परिषद् का 48वाँ वार्षिकोत्सव उत्साहपूर्वक संपन्न

हिन्दी भाषण प्रतियोगिता व सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने मोहा मन सूरीनाम हिन्दी परिषद् का 48वाँ स्थापना दिवस एवं हिन्दी पखवाड़े का शुभारंभ पाँच सितंबर को धूमधाम से मनाया गया। इस अवसर पर “हिन्दी भाषण प्रतियोगिता” का आयोजन किया गया, जिसमें प्रतिभागियों ने अपनी वक्तृत्व कला से श्रोताओं को प्रभावित किया। कार्यक्रम का शुभारंभ श्री करन जागेसर…

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नमन उन पितरों को, जिनसे है हमारी पहचान

पितृपक्ष केवल स्मरण का पर्व नहीं, बल्कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित रहने वाले संस्कारों और धरोहरों का अनुभव है। पितर कहीं दूर नहीं जाते, वे हर आँगन, हर देहरी और हमारे हावभाव तक में बसे रहते हैं। उनकी दी हुई सीख और आशीष ही हमें जीवनभर संबल देती है और हमारी पहचान को सहेजती है।

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परवरिश…

परवरिश, दरअसल वह निरंतर साधना है जहाँ संतान रूपी बीज को हम प्रेम, स्नेह और संस्कार की सिंचाई से अंकुरित करते हैं। समय-समय पर उचित मार्गदर्शन और देखभाल से यह पौधा धीरे-धीरे एक ऐसे वृक्ष में बदलता है, जो भविष्य में न केवल जिम्मेदार और संवेदनशील होता है, बल्कि समाज और परिवार के लिए फलदायी भी सिद्ध होता है।

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मुंबई: जहां हर धक्का सिखाता है जीना

मुंबई का आकर्षण दूर से देखने पर समंदर की लहरों, हैरिटेज इमारतों और तेज़ रफ्तार भागती ज़िंदगियों में नज़र आता है। लेकिन असली मुंबई की पहचान लोकल ट्रेनों की धक्का-मुक्की, जद्दोजहद और संघर्ष में छिपी है। यहाँ हर धक्का इंसान को जीना सिखाता है और हर मुश्किल उसे मज़बूत बनाती है।”

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सबसे सस्ती है आम आदमी की जान

अपने यहाँ सबसे सस्ती चीज नमक मानी गई है। पर रुकिए, सबसे सस्ती चीज नमक नहीं है, बल्कि अपने यहाँ सबसे सस्ती चीज है आम आदमी की जान।
असल में आम आदमी कहीं भी, कैसे भी मर सकता है; मार दिया जाता है या व्यवस्था की लापरवाही उसे मार डालती है और अगले दिन सब भुला दिया जाता है। आम आदमी की जान इतनी सस्ती है कि रहनुमाओं को कोई फर्क ही नहीं पड़ता।

मंदिरों में पर्वों पर श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है और अफरातफरी से, रेल दुर्घटनाओं से, पुल गिर जाने से, बनती इमारत ढह जाने से, स्टेडियम में दर्शकों की भीड़ में मारामारी से, रेलवे स्टेशन पर कुचलने से, मेलों-ठेलों में दबने से, घंटों जाम लगने से आम आदमी की जान चली जाती है। आम आदमी की जान, जान नहीं बल्कि मामूली सी चीज है। टेंशन क्या लेना, रोज ही तो मरते हैं।

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अमर बेल-सी है ज़िंदगी

ज़िंदगी अमर बेल की तरह है। यह अपने आप पनप उठती है, चाहे घर में ही क्यों न पड़ी हो। सूखती नहीं, बल्कि मिट्टी की तलाश करती है जहाँ अपना हरित तत्व फैला सके। इसमें खुद को समाप्त करने की प्रवृत्ति नहीं होती। नन्हीं-नन्हीं कोमल पत्तियाँ निकल आती हैं और बेल की लताएँ सूखी-मुरझाई डंडियों को भी ढक लेती हैं।

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शिक्षक का आशीर्वाद

बचपन में मैंने अक्सर शिक्षक बनने का खेल खेला था। आज समझ आता है कि वह खेल केवल खेल नहीं था, बल्कि एक गहरी सीख थी। शिक्षक होना वास्तव में प्रेम, धैर्य और आनंद की कला है। हर विद्यार्थी अलग होता है और उसके लिए नए ढंग से समझ का ताना-बाना बुनना पड़ता है।

शिक्षक की सबसे बड़ी पहचान उसकी सरलता है—वह कठिन से कठिन विषय भी सहज तरीके से समझा देता है। यही ईश्वर का दिया हुआ अमूल्य उपहार है। गुरु और शिष्य का रिश्ता पवित्र और जीवनभर साथ रहने वाला होता है। गुरु का आशीर्वाद शब्दों से भी भारी है, क्योंकि वही जीवन की सबसे बड़ी पूँजी है।

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सफ़र

ऐ वक्त, ज़रा ठहर जा। मुझे अपने आप से कुछ बातें करनी हैं। यादों की किताब में बिखरे किस्सों को फिर से पढ़ना है। बचपन के उन दिनों को याद करना है जब बेख़ौफ़ होकर खेलते और रातों को आसमान में तारे गिनते थे। सखियों संग बिताए यौवन के मधुर पलों को जीना है, जब बातें करते-करते पहर बीत जाते थे। बाबुल का घर, अम्मा का आंचल और भाई-बहनों का साथ छूटने की कसक अब भी भीतर कहीं घुटती है। सात वचन लेकर शुरू हुए नवजीवन की यादें भी हैं, जो धीरे-धीरे गृहस्थी की उलझनों में बिखर गईं। बच्चों की किलकारियों से गूंजते घर का आनंद था, जिसमें रातें भी उजली लगती थीं। समय कैसे बीत गया, यह समझ ही नहीं आया। अब जीवन की भाग-दौड़ में, शेष बची स्मृतियों के सहारे, सफ़र मानो शून्य की ओर बढ़ता जा रहा है।

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हिसाब–किताब में कच्ची हूँ

मैं हिसाब–किताब में कच्ची हूँ, लेकिन दिल से अब भी बच्ची ही हूँ। जोड़-घटाना ज़्यादा नहीं आता और भाग भी कुछ कम ही आता है। किसको क्या दिया था, यह भी याद नहीं रहता क्योंकि दिमाग़ ज़्यादा लगाना मेरी आदत नहीं। मुझे बस थोड़े से सुकून की तलाश रहती है और उसके लिए मैं किसी के पीछे भागती नहीं। मेरी कोशिश यही रहती है कि खुशी के छोटे-छोटे पल कहीं छूट न जाएँ, इसलिए उन्हें अपनी मुट्ठी में कैद कर लेती हूँ। दुख के बीते पल मैं रेत की भाँति बहा देती हूँ। इस तरह, मुट्ठी में समाए हुए पल मेरे अपने हो जाते हैं और दुख के सारे पल पीछे ही छूट जाते हैं।

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नेशनल बुक रीड डे : किताबों के साथ एक दिन

आज का नेशनल बुक रीड डे केवल एक तारीख नहीं, बल्कि किताबों के साथ समय बिताने, उन्हें पढ़ने और उनकी संगति का आनंद लेने का अवसर है। पढ़ना केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य के लिए लाभकारी है—यह तनाव कम करता है, याददाश्त और एकाग्रता बढ़ाता है, और कल्पनाओं को उड़ान देता है। किताबें हमें इतिहास से जोड़ती हैं, सोच बदलती हैं, और जीवन को नई दिशा देती हैं। चाहे बच्चों को पढ़कर सुनाएँ, दोस्त या परिवार के साथ साझा करें, या अकेले अपने कोने में बैठकर पढ़ें—किताबों का असली आनंद अनुभव और आत्मा से जुड़ने में है।

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