शमा और जिंदगी

काली रात में थरथराती हुई शमा की लौ अपने सपनों का प्रकाश लेकर जलती रहती है, चाहे हवा के झोंके उसे बुझाने की कोशिश करें। इसी तरह, ज़िंदगी भी निरंतर संघर्ष और कठिनाइयों के बीच आशाओं के साथ खड़ी रहती है। शमा दूसरों के अंधकार को दूर करने के लिए जलती है, और ज़िंदगी अपने पथ पर सपनों को आगे बढ़ाने के लिए बढ़ती रहती है। लौ का कंपकंपाना डर और अस्थिरता का प्रतीक है, लेकिन बुझने से पहले यह सौ गुना उजाला फैलाती है। शमा और जीवन दोनों यही सिखाते हैं—जलते रहो, उजागर रहो, संघर्ष और प्रकाश को अपनाओ, क्योंकि हर रात के बाद प्रभात अवश्य आता है।

Read More

जिंदगी और कट चाय

पल-पल बीतते जा रहे हैं, और जीवन का रस धीरे-धीरे खत्म होता जा रहा है। इसलिए बेकार की बातें छोड़कर मौजूदा समय का आनंद लेना चाहिए। मित्रों के साथ बिताए गए पल, उनकी हँसी, कभी-कभी उनके आँसुओं की चिंता, और साथ में पी गई चाय—ये सब छोटी-छोटी खुशियाँ जीवन को पूर्ण बनाती हैं। यह कविता समय की अनवरत गति, मित्रता, साधारण सुख और जीवन के क्षणों की क़ीमत का स्मरण कराती है।

Read More

अधूरी बारिश की दास्तान

गाँव का पता ही भूल गया हो। बादल चिट्ठियों की तरह आते हैं, लेकिन बिना संदेश दिए लौट जाते हैं। जिन पर “देवभूमि” लिखा होता है, वहाँ तो मेघदूत की तरह वे आँसू और वज्र के साथ बरसते हैं, पर यहाँ आँगन उमस और प्रतीक्षा में सूखा पड़ा है। खपरैल की छतें अब भी बारिश का पानी सोखने को तैयार बैठी हैं, और पेड़ों से पत्ते पीले होकर झरते जा रहे हैं। इस चित्रण में वर्षा की अनुपस्थिति केवल मौसम का अभाव नहीं है, बल्कि एक गहरी भावनात्मक कमी और विरह का प्रतीक बन जाती है।

Read More

स्त्री है त्रिशक्ति

स्त्री वास्तव में त्रिशक्ति का प्रतीक है—वह शारदा की ज्ञानमयी छवि है, शिवा की त्याग और साहस भरी ऊर्जा है और श्री की समृद्धि और करुणा से भरपूर है। उसका स्वरूप कभी पीपल की ठंडी छाँव-सा शीतल है तो कभी सावन की झड़ी-सा तरल और जीवनदायी। ठिठुरती सर्दियों में वह गुनगुनी धूप बन जाती है। सृष्टि की शुरुआत भी उसी से होती है और अंत भी उसी में समाया हुआ है।

Read More

एक प्रतीक्षा

प्रेम और प्रतीक्षा का यह गीत एक स्त्री की अंतःयात्रा है, जो अपने प्रिय के साथ की आशा में जीती है। वह कहती है कि उसने रोते-रोते भी हँसना सीखा, चाँद को लाने की चाह की, और सोते-सोते भी जाग उठी सिर्फ अपने प्रिय को बताने के लिए। लेकिन प्रिय फिर भी नहीं आ सका।वह डाल-डाल से झरकर उसकी रक्षा करने को तैयार रही, वियोगिनी बनकर तपस्विनी की तरह प्रतीक्षा-अरण्य में डोलती रही। बारिश की बूँदों-सी टपककर, पत्तों-सी झरकर उसने अपने प्रिय को सजाने का स्वप्न देखा। प्रणय के निलय में यह सोचते हुए जिया कि कभी न कभी यह स्वप्न पूरा होगा और गीत गाए जाएँगे। लेकिन वह क्षण नहीं आया।

Read More

प्रकृति…

प्रकृति हर पल हमें कुछ न कुछ सिखाती रहती है। ठंडी हवाएँ हमें कहती हैं कि चलते रहो, कभी मत रुको और अपना लक्ष्य पाकर ही ठहरो। चहचहाते पक्षी यह संदेश देते हैं कि परिस्थितियाँ जैसी भी हों, मुस्कुराते रहो और जीवन का आनंद लो। घड़ी की टिक-टिक हमें याद दिलाती है कि समय की कद्र करो, क्योंकि एक बार बीता हुआ वक्त कभी लौटकर नहीं आता। रिमझिम बारिश की बूँदें सब्र करने का पाठ पढ़ाती हैं और बताती हैं कि धैर्य का फल सदैव मीठा होता है। वहीं, जगमगाते जुगनू यह सीख देते हैं कि अंधेरों में भी रोशनी तलाशनी चाहिए। सच तो यह है कि प्रकृति अनजाने में ही हमें जीवन के गहरे सत्य सिखा देती है, लेकिन अक्सर हम इंसान इतने नासमझ होते हैं कि उन्हें समझ नहीं पाते।

Read More

उज्जैन में शरद जोशी की स्मृति में व्यंग्य गोष्ठी

मध्यप्रदेश लेखक संघ उज्जैन द्वारा हिन्दी व्यंग्य के प्रख्यात हस्ताक्षर शरद जोशी की स्मृति में आयोजित व्यंग्य गोष्ठी में साहित्य जगत के कई वरिष्ठ लेखक और व्यंग्यकार उपस्थित रहे। कार्यक्रम का आयोजन प्रेस क्लब, उज्जैन में किया गया, जिसमें व्यंग्यकारों ने शरद जी के अद्भुत साहित्यिक योगदान और उनके सामाजिक दृष्टिकोण पर प्रकाश डाला।

मुख्य अतिथि वरिष्ठ साहित्यकार और विक्रम विश्वविद्यालय के कुलानुशासक डॉ. शैलेन्द्रकुमार शर्मा ने कहा कि शरद जोशी सम्पूर्ण व्यंग्य परम्परा के विलक्षण व्यंग्यकार थे। उनके व्यंग्य में विषयों का वैविध्य था और वे आम जीवन के सामान्य विषयों को भी बड़े प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करते थे।

Read More

चिड़िया-सी उड़ान

मैं फिर से बच्ची बनना चाहती हूँ — बिना डर, बिना संकोच। खुलकर हँसना-रोना, बारिश में भीगना और सिर्फ माँ-पापा के दुलार में खो जाना। दुनिया की सोच से परे, कुछ पल के लिए सिर्फ अपने होने को जीना चाहती हूँ।”

Read More

तुम कितना बदल गए हो

“मैं तो आज भी वैसी ही हूँ, वही यादों और स्नेह में जीती हुई। बदल गए तो सिर्फ तुम—वो नज़रें, वो बातें, वो अपनापन सब पीछे छूट गया। अगर अब मैं बदल भी गई हूँ, तो सवाल मुझसे नहीं, खुद से करना।”

Read More

पितृपक्ष

पितृपक्ष का यह सोलह दिवसों का पर्व पूर्वजों की स्मृति और श्रद्धा का विशेष समय है। श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान से पितर प्रसन्न होकर आशीर्वाद देते हैं। वेद, उपनिषद और गीता में भी यही बताया गया है कि आत्मा अजर-अमर है और श्राद्ध से हमें पुण्य मिलता है। कौए और गौ सेवा का विधान पितृपक्ष को और भी पावन बना देता है।

Read More